मध्यप्रदेश की राजनीति में उमा भारती का विवादित बयान
मध्यप्रदेश की राजनीतिक हलकों में एक बार फिर से ‘माई का लाल’ बयान चर्चा का विषय बन गया है। इस बार यह बयान पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने एक कार्यक्रम के दौरान दिया, जिससे सवर्ण समाज में नाराजगी फैल गई है।
भोपाल की लोधी पंचायत में अपने भाषण के दौरान उमा भारती ने आरक्षण के समर्थन में कहा कि जब तक प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और चीफ जस्टिस के बच्चे गरीबों के बच्चों के साथ एक ही स्कूल में नहीं पढ़ने लगेंगे, तब तक कोई भी ‘माई का लाल’ आरक्षण को नहीं छीन सकता।
उमा भारती का बयान और सियासी संकेत
उमा भारती के इस बयान को उनकी संभावित राजनीतिक वापसी का संकेत माना जा रहा है। लंबे समय से सक्रिय राजनीति से दूर रहने के बावजूद, उनके हालिया तेवर यह दर्शाते हैं कि वे फिर से चुनावी मैदान में उतरने और संगठनात्मक भूमिका निभाने की कोशिश कर रही हैं।
हालांकि, इस बयान ने सवर्ण कर्मचारियों में नाराजगी पैदा कर दी है। मध्यप्रदेश ब्राह्मण अधिकारी कर्मचारी संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष अशोक पांडे ने कहा कि उमा भारती को यह बयान वापस लेना चाहिए, नहीं तो कर्मचारी आंदोलन मजबूर हो सकते हैं।
2018 के इतिहास की पुनरावृत्ति का खतरा
यह गुस्सा सत्तारूढ़ दल के लिए चिंता का कारण बन सकता है, क्योंकि इसी तरह का एक बयान 2018 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को नुकसान पहुंचा चुका है। उस समय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था कि ‘कोई माई का लाल आरक्षण खत्म नहीं कर सकता।’
अब पूरे आठ साल बाद, उमा भारती ने वही कथन दोहराया है। वरिष्ठ पत्रकार रविंद्र जैन का मानना है कि यह बयान एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है, क्योंकि उनके पास वर्तमान में कोई पद नहीं है और वे चुनाव लड़ने की इच्छा भी जता चुकी हैं।
यह स्पष्ट है कि उमा भारती का यह रुख सक्रिय राजनीति में लौटने का संकेत है, लेकिन देखना होगा कि पार्टी का वर्तमान शक्ति ढांचा उन्हें कितनी अहमियत देता है।









