धार जिले में भोजशाला और मस्जिद विवाद का नया मोड़
मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक स्थल भोजशाला और कमाल मौला मस्जिद के विवाद में मुस्लिम पक्ष ने हाई कोर्ट के समक्ष एक महत्वपूर्ण दस्तावेज प्रस्तुत किया है। इस मामले में वरिष्ठ वकील शोभा मेनन ने तर्क दिया कि 1935 में धार रियासत की अदालत ने एक आधिकारिक आदेश जारी कर इस स्थल को मस्जिद के रूप में मान्यता दी थी।
शोभा मेनन ने हाई कोर्ट की इंदौर बेंच के जजों के सामने मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधि मुनीर अहमद और अन्य की ओर से दाखिल याचिका का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि यह आदेश एक सरकारी प्रकाशन (Gazette) की तरह था, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि यहां नमाज का आयोजन जारी रहेगा।
मुस्लिम पक्ष का तर्क और ऐतिहासिक दस्तावेजों का महत्व
मेनन ने अदालत से आग्रह किया कि इस विवाद को धार्मिक नजरिए से नहीं, बल्कि कानून और ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर देखा जाए। उन्होंने यह भी बताया कि ब्रिटिश शासन के दौरान धार रियासत भोपाल एजेंसी के अधीन थी, और उस समय जारी आदेश को कानून का आधार माना जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पिछले वर्षों में इस स्थल के धार्मिक स्वरूप को लेकर सरकार और पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की अलग-अलग राय ने इस मामले को जटिल बना दिया है। मेनन ने कहा कि इन बदलावों से कानून का स्थिरता और विश्वसनीयता प्रभावित होती है, और सरकार को एक सुसंगत दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
जनहित याचिकाओं और विवाद की वर्तमान स्थिति
मेनन ने ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ नामक संगठन द्वारा दायर दो जनहित याचिकाओं पर भी सवाल उठाए। इन याचिकाओं में कहा गया है कि यह स्थल मूल रूप से एक सरस्वती मंदिर है और पूजा का अधिकार केवल हिंदुओं का ही है। उन्होंने तर्क दिया कि इस विवाद को व्यापक जनहित का मामला मानना कानूनी रूप से सही नहीं है, क्योंकि यह मुख्य रूप से एक विशिष्ट धार्मिक समुदाय से जुड़ा मामला है।
धार जिले में यह मामला अभी भी हाई कोर्ट में सुनवाई के चरण में है, जहां 6 अप्रैल से लगातार चार याचिकाओं और एक रिट याचिका पर सुनवाई चल रही है। इस विवादित स्थल को लेकर हिंदू समुदाय इसे देवी सरस्वती का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में प्रस्तुत करता है। यह स्थल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में है।










