सुप्रीम कोर्ट का लिव-इन रिलेशनशिप पर महत्वपूर्ण निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है, जिसमें कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति 15 वर्षों तक साथ रहता है और फिर रिश्ता टूट जाता है, तो इसे यौन उत्पीड़न नहीं माना जा सकता। जस्टिस नागरत्ना ने इस मामले में महिला को बच्चे के भरण-पोषण के लिए गुजारा-भत्ता देने और सुलह का सुझाव भी दिया। यह फैसला भारतीय कानूनी व्यवस्था में लिव-इन रिलेशनशिप की स्थिति को स्पष्ट करने का प्रयास है।
मामले की कानूनी जटिलताएँ और कोर्ट का दृष्टिकोण
मामले में महिला के वकील ने बताया कि उसकी मुवक्किल का पहले ही निधन हो चुका था, और उसके जीजा ने ही आरोपी से मिलवाया था। अदालत को यह भी सूचित किया गया कि आरोपी ने महिला से शादी का वादा किया था और उसके साथ यौन शोषण किया। इस पर अदालत ने पूछा कि शादी से पहले ही महिला उस पुरुष के साथ क्यों रहने लगी। वकील ने जवाब दिया कि महिला उसके साथ रही और उनका एक बच्चा भी है। जब रिश्ता टूटता है, तो यह कोई अपराध नहीं माना जाता, क्योंकि उनके बीच कोई कानूनी बंधन नहीं था।
शादी का झूठा वादा और कानूनी विकल्प
जब महिला के वकील ने आरोप लगाया कि आरोपी ने अपनी पहली शादी छुपाई और झूठा वादा किया, तो अदालत ने कहा कि यदि उनकी शादी हुई होती, तो महिला के अधिकार मजबूत होते। वह गुजारा-भत्ता का दावा कर सकती थी और शादी के आधार पर कानूनी कार्रवाई कर सकती थी। लेकिन चूंकि दोनों के बीच कोई शादी नहीं हुई थी और वे सिर्फ साथ रह रहे थे, इसलिए रिश्ता तोड़ने का जोखिम बना रहता है। अदालत ने सुझाव दिया कि महिला बच्चे के भरण-पोषण के लिए कानूनी उपाय कर सकती है और दोनों पक्षों को सुलह का रास्ता अपनाने की सलाह दी।











