डॉ. मोहन भागवत का युवा धर्म संसद में धर्म का महत्व
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने उज्जैन में आयोजित युवा धर्म संसद को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन में हर चीज़ बदलती रहती है, सुख-दुख का आना-जाना चलता रहता है। फिर भी, हमारा धर्म और जीवन का मूल तत्व स्थायी रहता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म हमारे डीएनए में समाया हुआ है।
भागवत ने बताया कि धर्म एक ऐसी अवधारणा है जिसे समझने में जन्म-जन्मांतर भी लग सकते हैं, फिर भी उसकी गहराई को समझना जरूरी है। उन्होंने कहा कि धर्म का एक कर्मकांड होता है, जो हमें अनुशासन में रहने का पाठ पढ़ाता है। नियमों का पालन और अनुशासन ही धर्म की पहचान है।
धर्म और रिलिजन में मुख्य फर्क और उनका अर्थ
उन्होंने आगे कहा कि पश्चिमी देशों ने धर्म को रिलिजन के रूप में परिवर्तित किया है, जबकि इन दोनों में मूलभूत अंतर है। रिलिजन का अर्थ है बंधन या अनुशासन, जबकि धर्म का अर्थ है स्वतंत्रता और मुक्ति। धर्म का मूल शब्द ‘धारणा’ से आया है, जिसका अर्थ है स्थिरता और टिकाऊपन। धर्म वह है जो हमें जोड़ता है, बिखरने नहीं देता और सदैव उन्नति की दिशा में ले जाता है।
भागवत ने यह भी कहा कि धर्म हमारे आचरण में व्याप्त है और यह भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों में हमारी प्रगति का आधार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संन्यास आश्रम का कोई धर्म नहीं है, बल्कि धर्म के नियम ही संन्यास का मार्ग दिखाते हैं। धर्म का असली स्वरूप है हमारे जीवन में स्थिरता और सदाचार।
युवाओं के लिए धर्म का संदेश और आत्मविकास का महत्व
डॉ. भागवत ने कहा कि मानवता का सबसे कमजोर प्राणी मनुष्य है, लेकिन उसकी बुद्धि ही उसे श्रेष्ठ बनाती है। धर्म हमारे डीएनए में है और यह सभी के लिए कल्याणकारी है। उनका मानना है कि हमें अपने बल, वैभव, धन और बुद्धि का विकास करना चाहिए। भारत के युवा न केवल विश्व में यशस्वी बनें, बल्कि सार्थक भी बनें।
उन्होंने युवाओं को प्रेरित किया कि वे अपने जीवन में धर्म का पालन करें, अपने व्यक्तित्व का विकास करें और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का संकल्प लें। धर्म का सही अर्थ समझकर जीवन को उन्नत बनाने का यह संदेश आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक है।










