जल संकट और भ्रष्टाचार का जटिल संबंध
प्रसिद्ध जल संरक्षण कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह ने दूषित पेयजल से होने वाली मौतों को एक गंभीर आपदा करार दिया है, जो उन्होंने सिस्टम की लापरवाही और भ्रष्टाचार का परिणाम बताया है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि भारत के सबसे स्वच्छ शहर में ऐसी स्थिति बन सकती है, तो अन्य शहरों में जल आपूर्ति की स्थिति कितनी भयावह होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
सिंह ने कहा कि इंदौर जैसे शहर में पानी की गुणवत्ता का संकट पूरी तरह से सरकारी व्यवस्था की खामियों का नतीजा है। उन्होंने आरोप लगाया कि ठेकेदार पैसे बचाने के लिए पाइपलाइन को ड्रेनेज लाइन के पास बिछाते हैं, जिससे दूषित पानी मुख्य जल स्रोत में मिल जाता है। इस भ्रष्टाचार ने पूरे जल प्रबंधन तंत्र को बर्बाद कर दिया है।
इंदौर में जल संकट की गंभीरता और सरकार की भूमिका
राजेंद्र सिंह ने बताया कि इंदौर का भूजल स्तर हर साल तेजी से गिर रहा है, जो शहर की सबसे बड़ी चिंता का विषय है। उन्होंने याद दिलाया कि 1992 में पहली बार जब वे इस शहर आए थे, तब भी उन्होंने पूछा था कि कब तक नर्मदा नदी के पानी पर निर्भर रहना पड़ेगा। आज स्थिति और भी चिंताजनक हो चुकी है, क्योंकि भूजल का स्तर खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है।
वर्तमान में, इंदौर में दूषित पानी से फैले डायरिया के कारण 142 लोग अस्पताल में भर्ती हैं, जिनमें से 11 आईसीयू में हैं। भागीरथपुरा इलाके में चल रहे सर्वे में 20 नए मरीज पाए गए हैं, जहां 2354 घरों में 9416 लोगों की जांच की गई। इस महामारी के कारण अब तक 398 मरीज अस्पतालों में भर्ती कराए गए हैं, जिनमें से 256 ठीक होकर घर लौट चुके हैं।
स्वास्थ्य संकट और भविष्य की चुनौतियां
डायरिया के इस प्रकोप ने शहर के स्वास्थ्य तंत्र की पोल खोल दी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस दौरान छह लोगों की मौत हो चुकी है। संक्रमण के केंद्र भागीरथपुरा में ही 20 नए मामले सामने आए हैं। वर्तमान में अस्पतालों में इलाज करा रहे मरीजों की संख्या 142 है, जिनमें से 11 आईसीयू में हैं। यह स्थिति जल प्रबंधन में सुधार और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है।











