सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार के बिजली कंपनियों के CAG ऑडिट पर लगाई रोक
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार द्वारा बिजली कंपनियों (डिस्कॉम) का नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) द्वारा ऑडिट कराने के आदेश पर स्थगन लगा दिया है। यह मामला उन बकाया राशि से जुड़ा है, जो लगभग 38,500 करोड़ रुपये की रेगुलेटरी एसेट्स (RA) के रूप में दर्ज है, और जिसे वर्षों से उपभोक्ताओं से वसूला जाना बाकी है। जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पार्ट टाइम वर्किंग डे बेंच ने इस आदेश को सुनाया।
दिल्ली सरकार का ऑडिट आदेश और कोर्ट का निर्णय
गुरुवार को दिल्ली सरकार ने बिजली डिस्कॉम कंपनियों का CAG ऑडिट कराने का आदेश जारी किया था, जिसमें भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) को उन परिस्थितियों की जांच करनी थी, जिनके कारण ये कंपनियां रेगुलेटरी एसेट्स की वसूली किए बिना ही कार्य कर रही थीं। इस ऑडिट के तहत बीएसईएस राजधानी पावर लिमिटेड (BRPL), बीएसईएस यमुना पावर लिमिटेड (BYPL), और टाटा पावर दिल्ली डिस्ट्रीब्यूशन लिमिटेड (TPDDL) की जांच होनी थी।
ऑडिट रोकने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला और आगे की स्थिति
अगले ही दिन शुक्रवार को यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में अपनी बात रखी। उन्होंने बिजली नियामक संस्था दिल्ली इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन (DERC) की ओर से पक्ष रखा। वहीं निजी डिस्कॉम कंपनियों के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने भी अपना पक्ष प्रस्तुत किया। दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद कोर्ट ने CAG ऑडिट के आदेश पर तत्काल रोक लगा दी। रेगुलेटरी एसेट्स का अर्थ है वह राशि जो बिजली कंपनियों ने पहले ही खर्च कर दी है, लेकिन अभी तक उपभोक्ताओं से बिल के माध्यम से वसूली नहीं हुई है। यह रकम धीरे-धीरे हर साल बढ़ती जाती है और अंततः उपभोक्ताओं के बिजली बिल में जुड़ जाती है। दिल्ली में यह राशि अब 38,500 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है, जो एक बहुत बड़ी संख्या है।










