दिल्ली हाई कोर्ट में सोशल मीडिया पर वीडियो शेयरिंग का विवाद
दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस तेजस करिया ने बुधवार को उस जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया, जिसमें अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी (AAP) के अन्य नेताओं के खिलाफ अदालत की कार्यवाही का वीडियो बिना अनुमति सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के आरोप में अदालत की अवमानना (Contempt of Court) की कार्रवाई की मांग की गई थी।
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यह मामला इस न्यायालय द्वारा नहीं सुना जाएगा। इसे कल ऐसी पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाएगा, जिसमें न्यायमूर्ति करिया सदस्य न हों। यह याचिका अधिवक्ता वैभव सिंह द्वारा दायर की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि 13 अप्रैल को हुई सुनवाई के दौरान जब केजरीवाल व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में उपस्थित थे और दिल्ली शराब नीति केस की सुनवाई से अलग होने की मांग कर रहे थे, उस कार्यवाही का वीडियो रिकॉर्ड कर सोशल मीडिया पर साझा किया गया।
सोशल मीडिया पर वीडियो शेयरिंग और न्यायपालिका की छवि पर सवाल
यह मामला उस याचिका से जुड़ा है जिसमें आरोप है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इन वीडियो को हटाने, नेताओं को ऐसी सामग्री साझा करने से रोकने और इस साजिश की जांच के लिए एसआईटी (SIT) गठित करने की मांग की गई है। जस्टिस तेजस करिया, जो पहले एक वकील के रूप में भी कार्य कर चुके हैं, 2024 में वैभव सिंह द्वारा दायर एक अन्य याचिका में फेसबुक (Meta) की ओर से पेश हो चुके हैं, जिसमें सुनीता केजरीवाल समेत अन्य पर अदालत की कार्यवाही का वीडियो प्रसारित करने का आरोप था।
आरोपों का मकसद और न्यायिक प्रक्रिया पर प्रभाव
याचिका में कहा गया है कि इन वीडियो को सोशल मीडिया पर शेयर कर न्यायपालिका की छवि को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया गया है, साथ ही जनता को गुमराह करने की कोशिश भी की गई है। इसमें यह भी तर्क दिया गया है कि इससे यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि न्यायपालिका राजनीतिक दबाव में काम कर रही है।
15 अप्रैल को अधिवक्ता वैभव सिंह ने इस मुद्दे पर दिल्ली हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को शिकायत भी दी थी। याचिका में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को निर्देश देने की भी मांग की गई है कि भविष्य में ऐसी अनधिकृत रिकॉर्डिंग के प्रसारण को रोका जाए।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि केजरीवाल और अन्य AAP नेताओं ने अदालत की कार्यवाही का वीडियो सोशल मीडिया पर साझा कर न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया है और जनता को भ्रमित करने का प्रयास किया है। इसमें यह भी कहा गया है कि इससे यह संदेश गया कि न्यायपालिका राजनीतिक दबाव में काम कर रही है।
इससे पहले 20 अप्रैल को जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अपने आदेश में अरविंद केजरीवाल की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें उन्होंने दिल्ली शराब नीति केस की सुनवाई से अलग होने की मांग की थी। उन्होंने कहा कि केजरीवाल ने अपने आरोपों के समर्थन में कोई ठोस सबूत नहीं पेश किए हैं और इन आरोपों का आधार संदेह और संकेत हैं।











