साहसिक न्यायिक प्रक्रिया में साढ़े छह महीने में सजा
सुनवाई की तेज़ी और न्यायिक प्रक्रिया की प्रभावशीलता का उदाहरण देते हुए सहरसा की अदालत ने डेढ़ साल की मासूम बच्ची से दुष्कर्म के मामले में आरोपी को अंतिम सांस तक सश्रम आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। इस फैसले के साथ ही अदालत ने आरोपी पर 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। इस पूरे मामले में पुलिस से लेकर अदालत तक की कार्रवाई लगभग छह महीने से भी कम समय में पूरी कर ली गई। फरवरी में हुई इस घटना के बाद बच्ची को रोते-बिलखते और लहूलुहान हालत में पाया गया था, जिससे परिजनों में भारी चिंता फैल गई।
तेज़ और वैज्ञानिक जांच के साथ आरोपी की गिरफ्तारी
घटना की गंभीरता को देखते हुए परिजनों ने तुरंत ही पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए तत्कालीन पुलिस कप्तान को सूचित किया। तत्पश्चात् एसपी हिमांशु ने घटनास्थल का निरीक्षण किया और परिजनों से मुलाकात कर आरोपी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का भरोसा दिलाया। इस घटना के तुरंत बाद ही पुलिस ने विशेष टीम का गठन किया, जिसमें स्पेशल टास्क फोर्स और एसआईटी शामिल थीं। साथ ही वैज्ञानिक तरीके से साक्ष्य जुटाने के लिए एफएसएल (Forensic Science Laboratory) की टीम को भी बुलाया गया। डीएनए जांच सहित सभी जरूरी साक्ष्यों को एकत्रित कर पुलिस ने आरोपी की तलाश शुरू कर दी।
तीन महीने में अदालत में सजा का फैसला
पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया और मामले से जुड़े साक्ष्यों को वैज्ञानिक तरीके से जुटाया। इस जांच में डीएनए परीक्षण भी शामिल था। पुलिस ने 14 मई को अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया, यानी कि मामला दर्ज होने के लगभग तीन महीने के भीतर। इसके बाद अदालत ने 4 जून को आरोपी के खिलाफ आरोप का गठन किया। सुनवाई के दौरान पुलिस द्वारा जुटाए गए साक्ष्यों और डीएनए रिपोर्ट को आधार बनाकर मामले की सुनवाई आगे बढ़ी। लगभग तीन महीने बाद 3 सितंबर को अदालत ने अपना फैसला सुनाया, जिसमें आरोपी को पॉक्सो एक्ट के तहत अंतिम सांस तक सश्रम आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। साथ ही उस पर 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया। इस तरह, साढ़े छह महीने के भीतर ही आरोपी को सजा मिल गई, जो न्याय की तत्परता का प्रतीक है।











