बिहार में महागठबंधन की प्रमुख घोषणा और राजनीतिक रणनीति
बिहार की राजधानी पटना में गुरुवार को महागठबंधन ने अपनी पहली संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की। इस कार्यक्रम के लिए मौर्या होटल में विशेष व्यवस्था की गई थी, जिसमें मंच पर 11 कुर्सियां सजी थीं और पीछे एक विशाल पोस्टर लगाया गया था। इस पोस्टर पर महागठबंधन के सभी घटक दलों के चुनाव चिन्ह और तेजस्वी यादव की तस्वीर के साथ उनका नारा भी prominently दिखाया गया था, जिसमें लिखा था “तेजस्वी सरकार का नारा”। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य यह स्पष्ट करना था कि यदि महागठबंधन सत्ता में आता है, तो तेजस्वी यादव ही मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे।
तेजस्वी यादव का सीएम उम्मीदवार के रूप में ऐलान और राजनीतिक संकेत
तेजस्वी यादव ने अपने नाम की घोषणा के साथ ही महागठबंधन के सभी सहयोगियों का धन्यवाद किया। यह घोषणा उस समय की गई, जब बिहार में 10 सीटों पर महागठबंधन के उम्मीदवार आमने-सामने हैं और पार्टी के भीतर ही दरार की खबरें भी चर्चा में थीं। कई राज्यों में कांग्रेस जैसी सहयोगी पार्टियों ने भी तेजस्वी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार न बनाने पर सवाल उठाए थे। इस बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पहली संयुक्त रैली से पहले ही तेजस्वी को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किया गया है।
लालू यादव और महागठबंधन की राजनीति पर तीखे आरोप
महागठबंधन के इस फैसले के बाद बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने लालू यादव पर हमला बोलते हुए कहा कि वह अपने परिवार के अलावा किसी को सत्ता नहीं देना चाहते। उन्होंने आरोप लगाया कि लालू यादव अपने बेटे को उम्मीदवार बनाने के लिए गुंडागर्दी कर रहे हैं और यह साफ संकेत है कि उनका मकसद सिर्फ अपने परिवार को ही मुख्यमंत्री बनाना है। साथ ही, गिरिराज सिंह जैसे भाजपा नेताओं ने भी लालू यादव पर आरोप लगाते हुए कहा कि उन्होंने अपने बेटों के लिए राजनीतिक घोषणा कराई है, जबकि प्रशांत किशोर ने लालू यादव के जंगलराज की वापसी का संकेत देते हुए कहा कि यदि लालू यादव का शासन लौटता है, तो तेजस्वी ही मुख्यमंत्री बनेंगे।
महागठबंधन की रणनीति और चुनावी समीकरण
तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने का मुख्य उद्देश्य वोट बैंक का विस्तार है। यादव मतदाताओं को एकजुट करने के साथ ही, निषाद समुदाय के नेता मुकेश सहनी को उपमुख्यमंत्री पद देकर अन्य वर्गों को भी संदेश भेजा गया है। इसके अलावा, इस रणनीति का मकसद यह भी है कि बिहार चुनाव में यह सवाल उठे कि तेजस्वी बनेंगे या नीतीश कुमार। नीतीश कुमार के समर्थक वोटरों में सस्पेंस बनाए रखने के लिए, महागठबंधन ने तेजस्वी के सुर को नीतीश पर बदला हुआ दिखाने की कोशिश की है।
नीतीश कुमार और वोट बैंक की राजनीति
पिछले दो दशकों के बिहार चुनावी इतिहास को देखें, तो नीतीश कुमार का नाम सत्ता से जुड़ा रहा है। इसकी मुख्य वजह उनके कुर्मी और कोइरी समुदाय पर मजबूत पकड़ है, जो कुल मिलाकर लगभग 43 प्रतिशत वोट बैंक बनाते हैं। 2015 के चुनाव में जब नीतीश कुमार आरजेडी के साथ थे, तो महागठबंधन को कुर्मी, कोइरी और अति पिछड़ा वर्ग का भारी समर्थन मिला था। वहीं, 2020 में जब वे एनडीए के साथ थे, तो इन वर्गों का समर्थन और भी मजबूत हो गया। तेजस्वी यादव अब इसी वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए नीतीश कुमार के खिलाफ अमित शाह के बयान का इस्तेमाल कर रहे हैं।
आगे की राजनीति और संभावित बदलाव
तेजस्वी यादव ने कहा है कि उनका मकसद नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने को लेकर चल रहे सस्पेंस का फायदा उठाना है। उन्होंने पूछा कि अमित शाह ने कहा था कि मुख्यमंत्री का चुनाव विधायक दल करेगा, तो इस बार क्यों नीतीश का नाम नहीं लिया जा रहा? बिहार के चुनावी इतिहास में नीतीश कुमार का नाम सत्ता का प्रतीक रहा है, और उनकी मजबूत पकड़ का कारण भी यही वोट बैंक है। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या एनडीए अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर होगा और क्या नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री बनेंगे, या फिर तेजस्वी यादव का दांव सत्ता के समीकरण बदल सकता है।











