दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान पुलिस लाठीचार्ज पर जस्टिस मदन लोकुर का कड़ा रुख
दिल्ली में 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस लाठीचार्ज की घटना पर पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस मदन लोकुर ने अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने पुलिसकर्मियों द्वारा बिना नेमटैग और सादे कपड़ों में प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज करने को पूरी तरह गैर-कानूनी करार दिया है। जस्टिस लोकुर ने स्पष्ट किया कि देश के कानून और प्रशासनिक नियम यह सुनिश्चित करते हैं कि पुलिसकर्मियों की पहचान स्पष्ट हो।
साफ़ पहचान का अधिकार और नियमों का उल्लंघन
पूर्व जज ने कहा, “कानून यह आवश्यक मानता है कि पुलिसकर्मियों के पास अपनी पहचान स्पष्ट रूप से दिखाने वाले नेमटैग या यूनिफॉर्म होना चाहिए। बिना नेमटैग वाले पुलिस अधिकारियों और सादे कपड़ों में मौजूद पुलिसकर्मियों द्वारा प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज करना पूरी तरह से गैर-कानूनी है।” उन्होंने यह भी बताया कि पुलिसकर्मियों की पहचान सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) और सुप्रीम कोर्ट की ओर से भी दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं।
अधिकारियों को जवाबदेही और उच्चस्तरीय जांच की मांग
जस्टिस लोकुर ने सवाल उठाया कि यदि पुलिसकर्मी बिना नेमप्लेट और सादे कपड़ों में प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज कर रहे थे, तो संबंधित पुलिस कमिश्नर या DCP को इसका जवाब देना चाहिए। उन्होंने कहा कि वरिष्ठ अधिकारियों को यह भी बताना होगा कि इस तरह की कार्रवाई की अनुमति कैसे दी गई। यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब 20 जुलाई को दिल्ली में हुए ‘चलो संसद’ मार्च के दौरान पुलिस की कार्रवाई को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में भी मामला दर्ज हो चुका है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पुलिस ने अत्यधिक बल का प्रयोग किया है, जबकि पुलिस और केंद्र सरकार का तर्क है कि भीड़ हिंसक हो गई थी और पथराव किया गया था।









