केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना का प्रभाव और विवाद
केन-बेतवा नदी जोड़ने की महत्वाकांक्षी परियोजना से प्रभावित आदिवासी महिलाएं और किसान फिर से अपने आंदोलन को शुरू कर चुके हैं। यह आंदोलन मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के एक गांव में केन की सहायक नदी बरना (Barna) के पास पुनः सक्रिय हो गया है। इस आंदोलन का नाम ‘चिता आंदोलन’ रखा गया है। यह विरोध प्रदर्शन अप्रैल महीने में तब स्थगित कर दिया गया था, जब अधिकारियों ने प्रभावित लोगों को आश्वासन दिया था कि उनकी समस्याओं का समाधान किया जाएगा।
आंदोलनकारियों का आरोप और सरकार की प्रतिक्रिया
जय किसान संगठन के नेता अमित भटनागर ने कहा, “अप्रैल 2026 में सरकार के आधिकारिक आश्वासन के बाद हमने ‘चिता आंदोलन’ को स्थगित कर दिया था। लेकिन सरकार ने न तो कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया दी और न ही आंदोलन के नेताओं के खिलाफ झूठे आरोप लगाकर हमें जेल में डाल दिया। जमानत मिलने के बाद भी 250 से अधिक लोगों पर झूठे मामले दर्ज किए गए हैं।” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रभावित गांवों में कोई ग्राम सभा नहीं बुलाई गई, जो कानून का उल्लंघन है। समुदायों से उनकी सहमति नहीं ली गई और न ही कोई सामाजिक प्रभाव आकलन रिपोर्ट जनता के सामने प्रस्तुत की गई।
परियोजना का उद्देश्य और पर्यावरणीय चिंता
यह परियोजना दिसंबर 2021 में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा मंजूर की गई थी, जिसकी लागत लगभग 44,605 करोड़ रुपये थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिसंबर 2024 में इसे शुरू किया था। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य यमुना की सहायक नदियों केन और बेतवा को जोड़कर बुंदेलखंड क्षेत्र में सूखे से निपटना है। इसमें मध्य प्रदेश के नौ और उत्तर प्रदेश के चार जिले शामिल हैं। सरकार का दावा है कि इससे लगभग 10.62 लाख हेक्टेयर जमीन की सिंचाई संभव होगी, जिसमें से 8.11 लाख हेक्टेयर मध्य प्रदेश में और 2.51 लाख हेक्टेयर उत्तर प्रदेश में आएंगे। साथ ही लगभग 62 लाख लोगों को पीने का पानी मिलेगा, और 103 मेगावाट जल विद्युत तथा 27 मेगावाट सौर ऊर्जा का उत्पादन भी संभव होगा।
हालांकि, इस परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर गंभीर चिंता जताई जा रही है। सरकारी अनुमानों के अनुसार, इससे करीब 6600 परिवार विस्थापित होंगे और लगभग 45 लाख पेड़ काटे जाएंगे। पन्ना नेशनल पार्क और टाइगर रिजर्व के अंदर केन नदी पर बांध बनाने का प्रस्ताव है, जिससे 2009 में खत्म हुए बाघों को फिर से यहां लाने का प्रयास किया जाएगा। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का तर्क है कि इस परियोजना से 9000 हेक्टेयर से अधिक जंगल डूब जाएगा, जिसमें पन्ना टाइगर रिजर्व का कोर क्षेत्र भी शामिल है। नीलम अहलूवालिया ने कहा, “यह एक जीवित और काम करने वाला इकोसिस्टम है, जिसमें बाघ, घड़ियाल, गंगा डॉल्फिन, गिद्ध, चिंकारा, भेड़िए और दुर्लभ महाशीर मछली रहते हैं।” उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमिटी ने इस परियोजना में अतिरिक्त पानी की उपलब्धता पर सवाल उठाए हैं और पर्यावरणीय दृष्टि से यह सही नहीं है।
कानूनी चुनौतियां और पर्यावरण मंजूरी पर सवाल
परियोजना को मिली फॉरेस्ट क्लीयरेंस की वैधता भी कानूनी विवादों में फंसी हुई है। मई 2017 में स्टेज-1 और अक्टूबर 2023 में स्टेज-2 पर दी गई मंजूरियों पर सवाल उठाए गए हैं। वॉटर पॉलिसी रिसर्चर हिमांशु ठक्कर ने कहा, “स्टेज-1 की शर्त 11 के तहत पेड़ों की नई गिनती जरूरी थी, लेकिन पन्ना टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर ने पुष्टि की कि ऐसी कोई गिनती नहीं की गई।” उन्होंने यह भी बताया कि मंजूरी की शर्त 43 के अनुसार, सभी आवश्यक कार्य एक साल के भीतर पूरे होने चाहिए, अन्यथा मंजूरी स्वतः समाप्त हो जाएगी।” उन्होंने यह भी पूछा कि वर्तमान में निर्माण कार्य किस कानूनी आधार पर चल रहा है, क्योंकि न तो फॉरेस्ट विभाग और न ही प्रोजेक्ट प्राधिकरण ने इस पर कोई स्पष्ट जवाब दिया है।










