अहोई अष्टमी व्रत का महत्व और परंपराएँ
अहोई अष्टमी व्रत भारत में एक विशेष धार्मिक त्योहार के रूप में मनाया जाता है, जिसमें माताएँ अपनी संतान की दीर्घायु और खुशहाली के लिए उपवास रखती हैं। इस व्रत के दौरान महिलाएँ पूरे दिन निर्जला उपवास करती हैं और शाम को माता अहोई की पूजा-अर्चना कर तारों को अर्घ्य अर्पित करती हैं। इसके पश्चात व्रत का पारण किया जाता है, माना जाता है कि ऐसा करने से संतान की आयु लंबी होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। इस दिन पूजा के साथ-साथ दान-पुण्य का भी विशेष महत्व होता है, जो पारिवारिक सुख और संतान की खुशहाली के लिए आवश्यक माना जाता है।
अहोई अष्टमी पर दान करने योग्य वस्तुएं
अहोई अष्टमी के दिन दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि ऐसा करने से संतान से जुड़ी सभी परेशानियों और दुखों का निवारण होता है। इस दिन जरूरतमंदों को भोजन कराना बहुत ही पुण्यदायक माना जाता है। इसके अलावा इस शुभ अवसर पर धन, कपड़े और अनाज का दान भी किया जाना चाहिए। इन वस्तुओं का दान करने से घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली का वास होता है, और संतान की रक्षा होती है। यह परंपरा भारतीय संस्कृति में विशेष स्थान रखती है, जो परिवारिक जीवन को मजबूत बनाती है।
अहोई अष्टमी का शुभ मुहूर्त और मंत्र जाप
अहोई अष्टमी का त्योहार 13 अक्टूबर 2025 को मनाया जाएगा। इस दिन माता अहोई की पूजा का शुभ समय शाम 5 बजकर 53 मिनट से लेकर 7 बजकर 8 मिनट तक रहेगा। इस पावन अवसर पर “ॐ पार्वतीप्रिय-नंदनाय नमः” मंत्र का जप करना अत्यंत लाभकारी माना जाता है। इस मंत्र का जाप श्रद्धा और भक्ति के साथ करने से व्रत का फल अधिक प्राप्त होता है और संतान की दीर्घायु की कामना पूरी होती है। यह दिन माता की पूजा और मंत्र जाप से जीवन में सुख-समृद्धि और खुशहाली का संचार करता है।











