अहोई अष्टमी का महत्व और परंपराएं
अहोई अष्टमी का त्योहार हर साल की तरह इस बार भी 13 अक्टूबर को मनाया जाएगा। यह व्रत मुख्य रूप से माताओं द्वारा अपने बच्चों की लंबी उम्र और समृद्धि के लिए किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत का पालन करने से संतान को दीर्घायु का आशीर्वाद प्राप्त होता है और जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है। इस दिन तारे को अर्घ्य देने का विशेष महत्व है, जो व्रत की पूर्णता और शुभता को बढ़ाता है। शाम के समय माता की पूजा-अर्चना के बाद आरती का पाठ करना इस पर्व का मुख्य हिस्सा माना जाता है।
अहोई अष्टमी की आरती और शुभ मंत्र
अहोई अष्टमी की पूजा के दौरान माता अहोई की आरती का पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है। इस आरती में माता को समर्पित मंत्र और गीत गाए जाते हैं, जो भक्तों के मन में श्रद्धा और भक्ति का संचार करते हैं। आरती के बोल इस प्रकार हैं: “जय अहोई माता, जय अहोई माता। तुमको निशिदिन सेवत हर विष्णु विधाता।” इसके साथ ही, माता रूप निरंजन, सुख-संपत्ति की दाता और शुभता की प्रतीक हैं। इस दिन माता की पूजा से घर में सुख, समृद्धि और मंगलकारी वातावरण का वास होता है।
अहोई अष्टमी का शुभ मुहूर्त और तिथि
अहोई अष्टमी व्रत के दिन पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5 बजकर 53 मिनट से शुरू होकर रात 7 बजकर 8 मिनट तक रहता है। वहीं, तारों को अर्घ्य देने का शुभ समय शाम 6 बजकर 17 मिनट से शुरू होता है। इन समयों में पूजा और अर्घ्य देने से व्रत की पूर्णता और शुभता सुनिश्चित होती है। यह जानकारी परंपरागत मान्यताओं पर आधारित है, इसलिए इसे श्रद्धा और भक्ति के साथ ही पालन करना चाहिए।










