केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के खिलाफ ग्रामीणों का तीव्र विरोध
मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में केन-बेतवा नदी जोड़ने की परियोजना को लेकर स्थानीय ग्रामीणों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है। जमीन और मुआवजे की मांग को लेकर उन्होंने अनूठे तरीके से प्रदर्शन शुरू किया है, जिनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गई हैं।
आंदोलन में भाग ले रही समत रानी ने घंटों पानी में खड़े रहकर अपना विरोध जताया। उनका कहना है कि उनके घर और जमीन का अधिग्रहण किया जा रहा है, लेकिन उन्हें अपनी आगे की जिंदगी को लेकर चिंता सता रही है। चेहरे पर मिट्टी लगाए हुए वह कहती हैं, “हमारी जमीन और घर छीने जा रहे हैं, हमें जंगल और नदी के बदले जंगल और नदी ही चाहिए।” उनके अनुसार, उनकी आजीविका मुख्य रूप से जंगल से मिलने वाले संसाधनों पर निर्भर है, जैसे महुआ, जलाऊ लकड़ी, तेंदूपत्ता आदि, जिनसे उन्हें आय मिलती है। उन्हें डर है कि जमीन और जंगल से दूर होने पर उनकी रोजी-रोटी पर असर पड़ेगा।
मुआवजे और सर्वे में हो रही गड़बड़ियों का आरोप
आंदोलन में शामिल आम आदमी पार्टी की स्थानीय पार्षद दिव्या अहिरवार का आरोप है कि जमीन अधिग्रहण के दौरान भूमि कानून (LARR 2013) का सही पालन नहीं किया गया है। उनका कहना है कि पुनर्वास और पुनर्स्थापन के प्रावधानों का भी उल्लंघन हुआ है। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि पन्ना टाइगर रिजर्व और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का सही आकलन नहीं किया गया है।
प्रदर्शनकारी गित्ती बाई का कहना है कि उन्हें केवल जमीन का मुआवजा मिला है, जबकि पेड़, मकान, पशु शेड और विस्थापन से जुड़ी अन्य सुविधाओं का लाभ नहीं मिला है। वहीं, बाबूराम पाल अपने जमीन के दस्तावेज दिखाते हुए दावा करते हैं कि सरकारी रिकॉर्ड में उनकी 5-6 जमीनें सिंचित दर्ज हैं, लेकिन सर्वे के दौरान कुछ जमीनों को असिंचित दिखाया गया, जिससे उन्हें लगभग 60 प्रतिशत कम मुआवजा मिला है।
केन-बेतवा लिंक परियोजना का परिचय और महत्व
केन-बेतवा लिंक परियोजना भारत की पहली नदी जोड़ो योजना है, जिसकी शुरुआत 1990 के दशक में हुई थी। पर्यावरणीय मुद्दों और पन्ना टाइगर रिजर्व पर संभावित प्रभाव के कारण यह परियोजना लंबे समय तक कानूनी अड़चनों में फंसी रही। दिसंबर 2021 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस परियोजना को मंजूरी दी, जिसकी अनुमानित लागत लगभग 44,605 करोड़ रुपये है। इसमें केंद्र सरकार की सहायता लगभग 39,317 करोड़ रुपये है।
इस परियोजना के अंतर्गत केन नदी के अतिरिक्त जल को दौधन बांध के माध्यम से एक नहर से बेतवा नदी तक पहुंचाया जाएगा। सरकार का दावा है कि इससे बुंदेलखंड क्षेत्र के मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कई जिलों में सिंचाई और पेयजल सुविधाएं बढ़ेंगी। इसका उद्देश्य करीब 10.62 लाख हेक्टेयर जमीन की सिंचाई और 62 लाख लोगों को पीने का पानी उपलब्ध कराना है। साथ ही, इसमें 103 मेगावाट हाइड्रो पावर और 27 मेगावाट सोलर पावर उत्पादन की योजना भी शामिल है।
प्रभावित गांवों की संख्या और प्रभावित समुदाय
प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार, दौधन बांध बनने से छतरपुर जिले के 14 और पन्ना जिले के 8 गांव प्रभावित होंगे। इन गांवों में बड़ी संख्या में आदिवासी, बंजारा और पिछड़े वर्ग के लोग रहते हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रभावित परिवारों की सूची में गड़बड़ियां हुई हैं। कुछ बाहरी लोगों के नाम भी शामिल कर दिए गए हैं, जो प्रभावित नहीं हैं, जबकि कई असली प्रभावित परिवार मुआवजे के लिए परेशान हो रहे हैं।
प्रशासन का कहना है कि सिंचित जमीन के लिए प्रति हेक्टेयर 7.5 लाख रुपये और असिंचित जमीन के लिए 3.75 लाख रुपये का मुआवजा तय किया गया है। इसके अलावा, प्रत्येक परिवार को 5 लाख रुपये की एकमुश्त सहायता भी दी जाएगी। मध्य प्रदेश सरकार अतिरिक्त 100 प्रतिशत मुआवजा भी दे रही है। कानून के अनुसार, पेड़, पशु शेड, घर बदलने का खर्च आदि के लिए भी मुआवजा निर्धारित है, लेकिन प्रभावित परिवारों का कहना है कि उन्हें इन मदों का लाभ नहीं मिल रहा है।
पर्यावरणीय चिंताओं के कारण भी इस परियोजना को लेकर सवाल उठते रहे हैं। दौधन बांध का क्षेत्र पन्ना टाइगर रिजर्व के पास आता है, जिससे जंगल और वन्यजीवों पर प्रभाव की आशंका बनी रहती है। जंगल से सटे गांवों में घर हटाने की कार्रवाई शुरू हो चुकी है, जिससे ग्रामीणों में भविष्य को लेकर डर और बढ़ गया है।
प्रशासन का पक्ष और आगे की राह
छतरपुर के अधिकारी पार्थ जायसवाल का कहना है कि प्रभावित लोगों की शिकायतें सुनने के लिए प्रशासन पूरी तरह तैयार है। उन्होंने कहा कि यदि प्रदर्शनकारी अपनी शिकायतें दर्ज कराते हैं, तो सर्वे और मुआवजे में हुई गड़बड़ियों की जांच कराई जाएगी। साथ ही, उन्होंने यह भी बताया कि पन्ना की दो अन्य बांध परियोजनाओं (मझगांव और रुंज) से प्रभावित कुछ लोग भी इस आंदोलन में शामिल हो गए हैं।
वर्तमान में केन-बेतवा परियोजना को लेकर ग्रामीणों और प्रशासन के बीच भरोसे की कमी देखी जा रही है। सरकार इसे बुंदेलखंड के लिए एक बड़ी उम्मीद मान रही है, जबकि प्रभावित परिवार अपने जमीन, जंगल और भविष्य को लेकर सवाल उठा रहे हैं। यही कारण है कि छतरपुर और पन्ना में यह विरोध तेज होता जा रहा है।











