ग्वालियर के अस्पताल में मान्यता की असलियत पर सवाल
क्या केवल कागजी दस्तावेजों के आधार पर अस्पतालों को मान्यता मिल सकती है? यह सवाल आज मेडिकल शिक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर चर्चा का विषय बन गया है। खासकर जब बात नर्सिंग कॉलेजों की मान्यता की हो, तो यह जरूरी हो जाता है कि वहां मरीजों की मौजूदगी और इलाज की वास्तविक स्थिति भी जांची जाए। मध्य प्रदेश के ग्वालियर से प्राप्त रिपोर्ट इस दिशा में कई अहम सवाल खड़े करती है।
मामले का वास्तविक स्वरूप और अस्पताल की स्थिति
ग्वालियर के धाकरे मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल का संचालन महाराणा प्रताप कॉलेज ऑफ नर्सिंग साइंस एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट और महाराणा प्रताप स्कूल ऑफ नर्सिंग द्वारा किया जाता है। इन्हीं संस्थानों से जुड़े इस अस्पताल को नर्सिंग कॉलेज का प्रैक्टिकल ट्रेनिंग स्थल माना गया है। लेकिन जब हमारी टीम ने मौके पर जाकर निरीक्षण किया, तो अस्पताल का मुख्य गेट ताले से बंद मिला। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि यह अस्पताल काफी समय से बंद पड़ा है।
अंदर जाकर देखा तो अस्पताल का माहौल सूना-सूना था। वार्ड खाली पड़े थे और मरीज कहीं नजर नहीं आए। दीवारों पर ओपीडी, सूचना और अन्य बोर्ड जरूर लगे थे, लेकिन अस्पताल में कोई गतिविधि नहीं दिख रही थी। बाहर निर्माण सामग्री और ईंटें रखी हुई थीं। सबसे नई बात यह थी कि अस्पताल का नाम का होर्डिंग भी नया लग रहा था।
पूरे परिसर में नर्सिंग स्टाफ या कर्मचारी का कोई भी सदस्य मौजूद नहीं था। जो कर्मचारी मिला, उसने खुद को किसी दूसरे डेंटल संस्थान का कर्मचारी बताया। अस्पताल के संचालक का दावा है कि यह अस्पताल कोविड के बाद बंद हो गया था और अब पुनः शुरू करने की प्रक्रिया चल रही है।
सामाजिक और प्रशासनिक पहलू
संचालक का कहना है कि अस्पताल में 100 बेड की सुविधा है, जिसमें एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, 20 बेड का आईसीयू, डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ और पैथोलॉजी की सेवाएं उपलब्ध हैं। सीएमएचओ (Chief Medical and Health Officer) के निरीक्षण के बाद ही कुछ कार्य पूरे किए जा रहे हैं, इसलिए फिलहाल अस्पताल दो दिनों के लिए बंद है।
ग्वालियर से करीब 50 नर्सिंग कॉलेजों ने साल 2026-27 के लिए मान्यता के लिए आवेदन किया है। इनमें से 38 कॉलेजों की जांच कलेक्टर (Collector) की अध्यक्षता में शुरू कर दी गई है। जांच के दौरान राजस्व विभाग के अधिकारी और तहसीलदार भी शामिल हैं, और तीन दिन के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रदेश में नर्सिंग कॉलेजों और उनके संबद्ध अस्पतालों में अनियमितताओं को लेकर हाईकोर्ट तक मामला पहुंच चुका है। सरकार ने मान्यता प्रक्रिया पर रोक लगाई थी, और अब पुनः जांच के बाद ही मान्यता दी जा रही है। सवाल यह है कि क्या यह जांच केवल कागजी दस्तावेजों तक सीमित रहेगी या फिर जमीनी हकीकत भी इसकी आधार बनेगी?









