धार की भोजशाला को लेकर हाईकोर्ट में अहम बहस
मध्य प्रदेश के इंदौर हाईकोर्ट की पीठ के समक्ष शुक्रवार को धार की ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर एक महत्वपूर्ण मामला सामने आया। हिंदू याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को इस स्थल के पारंपरिक धार्मिक स्वरूप को पुनः स्थापित करने का आदेश दिया जाए और यहां केवल हिंदुओं को पूजा करने की अनुमति दी जाए।
वकील विष्णु शंकर जैन ने जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच के सामने 7 अप्रैल 2003 के ASI के आदेश को कानून का उल्लंघन बताया। वर्तमान में, हिंदुओं को मंगलवार को पूजा और मुस्लिमों को शुक्रवार को नमाज की अनुमति है। जैन ने कहा कि ‘प्राचीन स्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम 1958’ के तहत किसी भी स्मारक का उपयोग उसके मूल धार्मिक स्वरूप के विपरीत नहीं किया जा सकता, जो हिंदू समुदाय के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
मामले में हिंदू और मुस्लिम पक्ष की दलीलें
मामले में हिंदू पक्ष ने दावा किया कि यह स्थल सदियों से पूजा का केंद्र रहा है और यहां हवन कुंड व मूर्तियां मौजूद हैं। धार की भोजशाला केस में हिंदू पक्ष ने अपनी दलीलें देते हुए कहा कि यह स्थल एक जैन मंदिर नहीं बल्कि एक प्राचीन सरस्वती मंदिर है, जिसकी स्थापना 1034 ईस्वी में परमार वंश के राजा भोज ने की थी।
वहीं, मुस्लिम पक्ष ने अपने तर्क में 1991 के कानून का हवाला देते हुए कहा कि यह परिसर 15 अगस्त 1947 को एक मस्जिद के रूप में अस्तित्व में था, इसलिए इसके स्वरूप में बदलाव नहीं किया जा सकता। मुस्लिम पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि इस स्थल का धार्मिक स्वरूप बदलने का कोई अधिकार नहीं है। विष्णु शंकर जैन ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि यह स्थल एक ASI संरक्षित स्मारक है, इसलिए 1991 का कानून इस पर लागू नहीं होता।
अदालत की अगली सुनवाई और मामले की संवेदनशीलता
हाईकोर्ट इस परिसर के धार्मिक स्वरूप से जुड़ी कुल पांच याचिकाओं और एक रिट याचिका पर एक साथ सुनवाई कर रहा है। इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए अदालत ने अगली सुनवाई के लिए 11 मई की तारीख तय की है। इस विवाद का समाधान धार्मिक और ऐतिहासिक दोनों दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।










