दतिया में फर्जी अधिकारी बनकर करोड़ों की ठगी का खुलासा
मध्य प्रदेश के दतिया जिले में एक युवक ने खुद को फर्जी डीआईजी और इंस्पेक्टर का दर्जा देकर दो प्रमुख सर्राफा कारोबारियों से करीब एक करोड़ नौ लाख पचास हजार रुपये की धोखाधड़ी कर ली। इस मामले में पुलिस ने जांच के दौरान रिटायर्ड प्रोफेसर की भूमिका भी उजागर की है। आरोपी को गिरफ्तार कर उसके बैंक खातों, संपत्तियों और नेटवर्क की विस्तृत जांच शुरू कर दी गई है।
साजिश रचने वाले रिटायर्ड प्रोफेसर का नाम सामने आया
पुलिस की जांच में पता चला है कि इस धोखाधड़ी की पूरी योजना रिटायर्ड प्रोफेसर अशोक कुमार गुप्ता ने बनाई थी। उन्होंने अपने पुराने परिचय का फायदा उठाते हुए मनीष कुमार को अपने साथ शामिल किया। अक्टूबर 2024 में, मनीष कुमार ने काली वर्दी पहनकर अरविंद अग्रवाल की दुकान पर पहुंचकर खुद को एंटी करप्शन एंड क्राइम कंट्रोल फोर्स का डीआईजी बताया। उसने एक कथित एफआईआर दिखाकर कारोबारी को जेल भेजने की धमकी दी। इसके बाद, समझौता और केस खत्म कराने के नाम पर ब्लैकमेलिंग का सिलसिला शुरू हो गया।
धोखाधड़ी का शिकार बनी कारोबारी परिवार की पीढ़ी
डरे हुए कारोबारी ने अक्टूबर 2024 से मार्च 2025 के बीच अलग-अलग किश्तों में लगभग 80 लाख रुपये आरोपियों को दिए। आरोप है कि हर बार नई कहानी बनाकर उनसे पैसे वसूले गए। इसके बाद, आरोपियों ने कारोबारी के भतीजे को निशाना बनाया। जून 2025 में, मनीष कुमार ने खुद को झांसी के एंटी करप्शन ब्यूरो का इंस्पेक्टर बताकर दिवंगत रोहित अग्रवाल के बेटे प्रियांश सिंघल की दुकान पर पहुंचा। उसने दावा किया कि प्रियांश के पिता पर सोने का बकाया है और इसकी शिकायत विभाग में पहुंच चुकी है। डर दिखाकर जून से अगस्त 2025 के बीच, प्रियांश से भी करीब 29 लाख 50 हजार रुपये वसूल लिए गए। इस तरह, दोनों कारोबारियों से कुल 1 करोड़ 9 लाख 50 हजार रुपये की ठगी कर ली गई। आरोपी खुद को वरिष्ठ अधिकारी बताकर रौब गांठता रहा, जबकि उसकी असलियत का किसी को पता नहीं चला।
सच्चाई का खुलासा और पुलिस की कार्रवाई
पूरा मामला तब सामने आया जब प्रियांश सिंघल ने कलेक्ट्रेट में हुई मुलाकात के दौरान सीधे प्रोफेसर अशोक कुमार गुप्ता से उस अधिकारी की शिकायत कर दी, जो लगातार उनसे पैसे मांग रहा था। इस पर प्रोफेसर ने मनीष कुमार को पहचानने से इनकार कर दिया। यहीं से संदेह हुआ कि मामला कुछ गड़बड़ है। खुद जांच में जुटे प्रियांश ने झांसी जाकर पड़ताल की तो पता चला कि विभाग में मनीष कुमार नाम का कोई अधिकारी नहीं है। इसके बाद, पुलिस को शिकायत दी गई। 10 जून को पुलिस ने जाल बिछाया और आरोपी को पैसे देने के बहाने बुलाकर गिरफ्तार कर लिया। अब पुलिस उसकी बैंक खातों, संपत्तियों, कॉल डिटेल और पूरे नेटवर्क की गहन जांच कर रही है।











