दतिया विधानसभा उपचुनाव में राजनीतिक उथल-पुथल का दौर
मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर आगामी उपचुनाव की घोषणा के साथ ही भारतीय जनता पार्टी (BJP) के भीतर गहरा असंतोष उभर आया है। यह असंतोष उस समय और भी तेज हो गया जब पार्टी ने पूर्व संभागीय संगठन मंत्री आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाने का फैसला किया, जबकि पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं का मानना था कि यह निर्णय पार्टी के अंदरूनी समीकरणों के खिलाफ है। इस फैसले के विरोध में दतिया में कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया और कई स्थानों पर दुकानें बंद कर दीं। प्रदर्शनकारियों ने मुख्य हाईवे को जाम कर टायर जलाए और जोरदार नारेबाजी की, जिससे क्षेत्र में तनाव का माहौल बन गया।
पार्टी नेतृत्व के खिलाफ आक्रोश और इस्तीफे का सिलसिला
इस विवाद का सबसे बड़ा झटका संगठन को तब लगा जब भाजपा के जिला अध्यक्ष रघुवीर सिंह कुशवाह ने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल को अपना सामूहिक इस्तीफा भेज दिया। उन्होंने अपने पत्र में कहा कि पार्टी का यह निर्णय एकतरफा है और कार्यकर्ताओं का अपमान है। कुशवाह ने अपने साथ सभी भाजपा पार्षदों और पदाधिकारियों के इस्तीफे की घोषणा भी की। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि पार्टी ने जल्द ही आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार नहीं बनाया, तो वे अपनी सदस्यता भी त्याग देंगे। इस कदम ने पार्टी के अंदर गहरी खींचतान को उजागर कर दिया है।
दतिया उपचुनाव का राजनीतिक परिदृश्य और भविष्य की राह
यह उपचुनाव इसलिए जरूरी हो गया है क्योंकि कांग्रेस के विधायक राजेंद्र भारती की विधानसभा सदस्यता को दिल्ली की एक अदालत ने धोखाधड़ी के एक पुराने मामले में तीन साल की सजा सुनाने के बाद रद्द कर दिया है। इस फैसले के बाद ही दतिया में उपचुनाव की नौबत आई है। पार्टी ने इस बार आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाकर अपने पुराने नेता नरोत्तम मिश्रा का टिकट काट दिया है, जो पिछले चुनाव में भाजपा के मजबूत स्तंभ थे। इस निर्णय के पीछे पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का मानना है कि यह कदम जमीनी फीडबैक और चुनावी रणनीति के आधार पर लिया गया है।
वहीं, नरोत्तम मिश्रा के समर्थक और क्षेत्रीय कार्यकर्ता इस फैसले का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि पिछले 15 वर्षों में मिश्रा ने दतिया का विकास किया है और वे इस उपचुनाव के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि आशुतोष तिवारी को जनता और कार्यकर्ता नहीं जानते, और यदि पूरी ताकत से कार्यकर्ता सड़क पर उतर गए, तो चुनाव का परिणाम भी बदल सकता है। इस बीच, राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर नजर गड़ा रहे हैं कि क्या पार्टी अपने इस फैसले को बदलेगी या फिर नरोत्तम मिश्रा अपने समर्थकों के साथ चुनाव मैदान में उतरेंगे।











