तनोडिया की रामलीला परंपरा का ऐतिहासिक सफर
मध्य प्रदेश के आगर मालवा जिले के तनोडिया कस्बे में हर साल होने वाली रामलीला की परंपरा करीब 75 वर्षों से जीवित है। यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि स्थानीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। 1951 में शुरू हुई यह परंपरा उस समय से लगातार जारी है, जब देश अभी स्वतंत्रता के शुरुआती दौर में था। उस समय के कस्बे के लोगों ने अपने ही घर के आसपास रामायण की कहानियों को मंचित करना शुरू किया, जो आज भी उसी उत्साह और श्रद्धा के साथ जीवित है।
स्थानीय कलाकारों की भागीदारी और सांस्कृतिक विरासत
यहां के कलाकारों में शिक्षक, युवा और ग्रामीण सभी शामिल हैं, जो अपने ही कस्बे के लोगों को रामायण के किरदार निभाते देखना गर्व का विषय मानते हैं। राम, लक्ष्मण, रावण जैसे प्रमुख पात्रों को निभाने वाले कलाकार भी स्थानीय ही हैं। शिक्षक धर्मेंद्र सिंह राठौर का कहना है कि यह परंपरा उनके गांव की सांस्कृतिक धरोहर है, जिसे वे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना चाहते हैं। इसी तरह, लक्ष्मण का किरदार निभाने वाले शिक्षक सर्वेश घोंसले का मानना है कि रामायण के पात्र जीवन के आदर्श हैं, जो आज भी लोगों को सही मार्ग दिखाते हैं।
आधुनिकता के बीच भी परंपरा का जिंदा रहना
आज के डिजिटल युग में मनोरंजन का साधन मोबाइल और टीवी हैं, लेकिन तनोडिया में हर साल लोग घर छोड़कर मंच पर पहुंचते हैं। यहां का रामलीला मंच केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पूरे कस्बे का सांस्कृतिक मिलन स्थल बन जाता है। स्थानीय कलाकारों के साथ बाहर से भी संगीतकार और नर्तक आते हैं, जो इस आयोजन को और भी रंगीन बना देते हैं। इस परंपरा में पीढ़ियों का बदलाव जरूर आया है, लेकिन मंच की रोशनी और उसकी जीवंतता आज भी कायम है। 1951 में शुरू हुई यह परंपरा आज भी नई पीढ़ी को अपने साथ जोड़ती है, और यह दिखाती है कि सांस्कृतिक विरासत कितनी मजबूत हो सकती है।










