हरियाणा के सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का उदाहरण
फरीदाबाद के बीके सिविल अस्पताल में हुई यह घटना न केवल एक परिवार की पीड़ा है, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य प्रणाली की गंभीर खामियों का भी खुलासा करती है। यह अस्पताल, जिसे आमतौर पर गरीबों के जीवन रक्षक माना जाता है, वहां एक महिला की मौत के बाद भी उसके शव को सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार के लिए नहीं दिया गया। इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि सरकारी अस्पतालों में मानवता और संवेदना का अभाव कितना गहरा है।
अस्पताल की लापरवाही और सरकारी एंबुलेंस का अभाव
मृतका का घर अस्पताल से महज सात किलोमीटर दूर सारण गांव में था, लेकिन इसके बावजूद अस्पताल प्रशासन ने कोई भी मुफ्त सरकारी एंबुलेंस उपलब्ध नहीं कराई। यह वही एंबुलेंस सेवा है, जिसे सरकार 24 घंटे और मुफ्त में उपलब्ध कराने का दावा करती है। परिणामस्वरूप, एक गरीब मजदूर को अपनी पत्नी का शव ठेले पर रखकर ले जाना पड़ा, क्योंकि डेढ़ घंटे तक इंतजार करने के बाद भी कोई सरकारी शव वाहन नहीं पहुंचा। यह घटना सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खोलती है और उनके दावों की पोल खोलती है।
परिवार की आर्थिक स्थिति और अस्पताल की उदासीनता
मृतका के पति गुनगुन ने बताया कि उनकी पत्नी पिछले तीन महीनों से टीबी से पीड़ित थीं और उनका इलाज फरीदाबाद के सिविल अस्पताल में चल रहा था। हालत बिगड़ने पर उन्हें सफदरजंग और एम्स जैसे बड़े अस्पतालों में रेफर किया गया, जहां भी सिस्टम की खामियों का सामना करना पड़ा। पूरे परिवार ने इलाज में तीन से चार लाख रुपये खर्च किए, लेकिन जब पैसे खत्म हो गए, तो फिर से सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया। बुधवार दोपहर उसकी मौत हो गई। मौत के बाद अस्पताल ने साफ इनकार कर दिया कि कोई सरकारी वाहन उपलब्ध है। प्राइवेट एंबुलेंस की सेवाएं भी महंगी थीं, और मजदूर के लिए वह भी असंभव साबित हुई। अंत में, गुनगुन ने अपनी पत्नी का शव अपने ही ठेले पर रखकर अस्पताल से निकाला, जो सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का प्रतीक बन गया है। अब उनके पास दाह संस्कार के पैसे भी नहीं हैं, और उन्हें कर्ज लेना पड़ेगा। इस पूरे घटनाक्रम ने सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खोल दी है, जो केवल कागजों और भाषणों में ही जीवित हैं।











