सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: ट्रेन हादसों में मुआवजे का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (17 जुलाई) को एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया कि ट्रेन दुर्घटना में जान गंवाने वाले व्यक्ति का टिकट न मिलना भी उसके परिजनों को मुआवजा पाने से नहीं रोक सकता। यह फैसला 2015 में हुए एक रेल हादसे में मृतक की पत्नी की याचिका पर सुनवाई के दौरान आया। कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर विधवा लता को आठ लाख रुपये का मुआवजा प्रदान करे।
रेलवे यात्रियों के अधिकारों को मजबूत करने वाला फैसला
इस फैसले ने रेलवे यात्रियों और उनके परिवारों के अधिकारों को सशक्त किया है। कोर्ट ने रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के समान आदेशों को रद्द कर दिया। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने विधवा की अपील स्वीकार करते हुए कहा कि केवल टिकट न होने के आधार पर किसी व्यक्ति को बोना फाइड पैसेंजर मानने से इनकार नहीं किया जा सकता। पहले इन दोनों न्यायालयों ने इसी आधार पर मुआवजे का दावा खारिज कर दिया था।
रेलवे कानून की व्याख्या और सुरक्षा पर न्यायालय की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि रेलवे एक्ट एक कल्याणकारी कानून है, जिसकी व्याख्या लिबरल और उद्देश्यपूर्ण तरीके से होनी चाहिए। न्यायमूर्ति संजय करोल ने अपने फैसले में पुराने निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि कानून की व्याख्या शब्दों के संकीर्ण अर्थ पर आधारित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसके उद्देश्य को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए ताकि कानून का असली मकसद पूरा हो सके।
अदालत ने रेलवे सुरक्षा और यात्रियों के हितों को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। कोर्ट ने कहा कि तकनीकी खामियों या प्रक्रियात्मक छोटी-मोटी गलतियों का प्रभाव कानून के उस उद्देश्य को कमजोर नहीं कर सकता, जिसका मकसद पीड़ितों और उनके परिवारों को राहत देना है। साथ ही, कोर्ट ने यह भी कहा कि रेलवे जैसी सरकारी संस्था को अत्यधिक संकीर्ण और तकनीकी दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहिए।
मुआवजे का आधार और रेलवे की जिम्मेदारी
कोर्ट ने कहा कि रेलवे एक्ट की धारा 124ए के तहत मुआवजे की व्यवस्था ‘नो-फॉल्ट लाइबिलिटी’ के सिद्धांत पर आधारित है। इसका अर्थ है कि पीड़ित या उसके परिजन को हादसे में लापरवाही साबित करने की आवश्यकता नहीं है। यदि मृतक के पास ट्रेन का टिकट नहीं था, तो भी केवल इसी आधार पर उसे बोना फाइड पैसेंजर मानने से इनकार नहीं किया जा सकता। शुरुआती स्तर पर दावेदार अपने एफिडेविट और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के माध्यम से अपना दावा प्रस्तुत कर सकते हैं, जिसे रेलवे को गलत साबित करना होगा।
यह मामला 2015 में रायपुर से अहमदाबाद की यात्रा के दौरान चंद्रकांत ठक्कर की मौत से जुड़ा है। आरोप है कि वह अहमदाबाद-हावड़ा मेल ट्रेन से गिर गए थे, और उनका ट्रैवल बैग जिसमें टिकट था, गायब हो गया था। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी पत्नी की याचिका स्वीकार करते हुए रेलवे को आठ लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। केंद्र सरकार को चार सप्ताह के भीतर राशि जारी करने का निर्देश भी दिया गया। यदि भुगतान समय पर नहीं होता, तो उस तारीख से आठ प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
यात्रियों की सुरक्षा और रेलवे के संचालन में सुधार
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था और यात्रियों के हितों को लेकर भी कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए। अदालत ने कहा कि टिकट जांच, भीड़ प्रबंधन और यात्री सुरक्षा के लिए बनाए गए ऑपरेशनल मैनुअल का प्रभावी पालन अभी भी एक बड़ी चुनौती है। ट्रेनों में भीड़भाड़ की समस्या आज भी आम है, जिससे कई जानलेवा हादसे हो चुके हैं। कोर्ट ने सुझाव दिया कि रेलवे अपने कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने पर विचार करे, ताकि यात्रियों की सुरक्षा बेहतर हो सके और साथ ही युवाओं को रोजगार भी मिल सके।
अंत में, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में रेलवे के मैनुअल और दस्तावेजों में ‘सेकेंड क्लास पैसेंजर’ शब्द का प्रयोग बदलने का सुझाव दिया। कोर्ट का मानना है कि यह शब्द वर्गभेद का भाव पैदा कर सकता है, इसलिए इसे केवल कोच के संदर्भ में ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए, ताकि संविधान के समानता और गरिमा के मूल्यों का सम्मान हो सके।









