सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़ी नकदी जांच याचिका खारिज की
सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व दिल्ली हाईकोर्ट जज जस्टिस यशवंत वर्मा से संबंधित चर्चित “जली हुई नकदी” मामले में एफआईआर दर्ज करने और कोर्ट की निगरानी में एसआईटी जांच की याचिका को अस्वीकार कर दिया है। यह याचिका एक वकील द्वारा दायर की गई थी, जिसे कोर्ट ने पब्लिसिटी के उद्देश्य से दाखिल माना और सुनवाई से इनकार कर दिया।
याचिका और कोर्ट का निर्णय
यह मामला जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की बेंच के समक्ष आया। याचिका दायर करने वाले वकील घनश्याम उपाध्याय ने खुद कोर्ट में पक्ष रखा और बताया कि उन्होंने इस मामले में शिकायत दर्ज कराई है। उन्होंने यह भी कहा कि वे एक प्रैक्टिसिंग एडवोकेट हैं और कोर्ट से पूछा गया कि क्या वे इस मामले में पक्षकार हैं, तो उन्होंने हां में जवाब दिया।
मामले की मुख्य दलील और कोर्ट का रुख
याचिका में मुख्य तर्क यह था कि किसी जज का पद से इस्तीफा देना उसकी बेहिसाब नकदी से जुड़ी आपराधिक जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता। यानी, इस्तीफा देने के बाद भी कानूनी जांच और आवश्यक होने पर एफआईआर दर्ज होनी चाहिए। याचिका में यह भी कहा गया कि 23 मार्च 2025 को यशवंत वर्मा के घर के पास मलबे में जली हुई मुद्रा के टुकड़े पाए गए थे।
याचिका में यह भी मांग की गई थी कि इस पूरे मामले की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित किया जाए और यह जांच सीधे कोर्ट की निगरानी में हो। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह याचिका सस्ती पब्लिसिटी पाने के उद्देश्य से दाखिल की गई प्रतीत होती है और इसे कोर्ट की प्रक्रिया का दुरुपयोग माना। इसके बाद कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।
जस्टिस यशवंत वर्मा का जली हुई नकदी का मामला पहले से ही देशभर में चर्चा का विषय रहा है, और कोर्ट के इस निर्णय के बाद यह मामला फिलहाल ठप हो गया है।










