जंतर-मंतर प्रदर्शन के बाद पुलिसकर्मियों के परिवारों का दर्द
दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के कई दिन बीत चुके हैं, लेकिन उस दिन हुई हिंसा के जख्म अभी भी पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों के दिलों में ताजा हैं। इस हिंसक घटना के बाद से ही घायल पुलिसकर्मियों के परिवार पहली बार सामने आए हैं और उन्होंने उस भयावह दिन की भयावहता, डर और पीड़ा को साझा किया। प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई झड़प में कई पुलिसकर्मी घायल हुए थे। किसी के सिर पर गंभीर चोट लगी, तो किसी को भीड़ ने घेरकर पीटा। अब इन पुलिसकर्मियों के परिवार का कहना है कि ड्यूटी के दौरान हुई ऐसी घटनाओं का प्रभाव सिर्फ घायल पुलिसकर्मी पर ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार पर भी पड़ता है।
घायल पुलिसकर्मियों की पीड़ा और परिवार का दर्द
इन घायल पुलिसकर्मियों में इंस्पेक्टर नंद किशोर भी शामिल हैं, जो 22 जुलाई की रात करीब आठ बजे अपनी कार पार्क कर ड्यूटी पर जा रहे थे। उसी समय भीड़ ने उन्हें घेर लिया और उनकी पिटाई कर दी। अगले दिन 23 जुलाई को उनका इंटरव्यू था, लेकिन तब उनके सिर पर पट्टी बंधी हुई थी और वे इलाज करा रहे थे। पहली बार उनके परिवार ने इस घटना पर खुलकर अपनी बात रखी है। उनकी बेटी का कहना है कि प्रदर्शन करना हर नागरिक का अधिकार है और यह आंदोलन सही भी हो सकता है, लेकिन पुलिसकर्मियों के साथ हुई हिंसा पूरी तरह गलत थी।
परिवारों का कहना है कि हिंसा से होता है नुकसान
नंद किशोर की पत्नी का कहना है कि उस घटना के बाद से ही उन्हें हर समय डर सताने लगा है। उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाएं नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यह परिवार के लिए किसी बड़े सदमे से कम नहीं है। इसी तरह की कहानी बुराड़ी निवासी एसआई अशोक मीणा के परिवार की भी है। प्रदर्शन के पहले दिन से ही वह संसद मार्ग थाना क्षेत्र में जंतर-मंतर के पास ड्यूटी पर तैनात थे। प्रदर्शन के दौरान जब कुछ प्रदर्शनकारी संसद की ओर बढ़ने लगे, तो पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की। इसी दौरान पुलिस पर हमला हुआ, जिसमें अशोक मीणा को गंभीर चोटें आईं। उनके परिवार का कहना है कि किसी भारी वस्तु से उनके सिर पर हमला किया गया, जिससे वह सदमे में आ गए।










