धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की खबर के बाद जंतर-मंतर पर एक जश्न का माहौल देखने को मिला, जहां कई समर्थक और नेता इस फैसले का स्वागत कर रहे थे। हालांकि, इस मौके पर अभिजीत दिपके, जो कि CJP (Citizen Justice and Peace) के संस्थापक हैं, ने अपने समर्थकों के बीच जीत का जश्न मनाया। लेकिन आश्चर्य की बात यह रही कि इस समारोह में आंदोलन की प्रमुख चेहरा सोनम वांगचुक का नाम तक नहीं लिया गया। वांगचुक ने 26 दिनों का अनशन कर इस आंदोलन को व्यापक रूप से चर्चा में ला दिया था, जिससे सरकार और जनता दोनों का ध्यान इस मुद्दे की ओर आकर्षित हुआ।
सोनम वांगचुक का अनशन और आंदोलन की दिशा
सोनम वांगचुक का अनशन देशभर में चर्चा का विषय बन गया था, क्योंकि उन्होंने अपनी भूख हड़ताल के माध्यम से सरकार की नीतियों के खिलाफ आवाज उठाई थी। जैसे-जैसे उनके अनशन के दिन बढ़ते गए, उनकी सेहत गंभीर हो गई और उन्हें गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराना पड़ा। सोशल मीडिया पर लाखों लोगों ने उनके समर्थन में अपनी प्रोफाइल तस्वीरें बदलकर “आई सपोर्ट सोनम” का संदेश फैलाया। इस आंदोलन ने देश में लोकतंत्र की ताकत और नागरिकों की आवाज को मजबूत किया, जिससे सरकार पर दबाव बना।
आंदोलन का मोड़ और राजनीतिक प्रतिक्रिया
20 जुलाई को जब संसद मार्च के दौरान पुलिस ने बल प्रयोग किया, तो जनता का गुस्सा फूट पड़ा और हजारों की संख्या में लोग जंतर-मंतर पर पहुंच गए। इस घटना ने आंदोलन का रुख ही बदल दिया। 22 जुलाई को केंद्रीय मंत्रियों जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह ने सोनम वांगचुक से मुलाकात की, जिसके बाद उन्होंने अपना 26 दिनों का उपवास तोड़ दिया। इस कदम से आंदोलन में नई ऊर्जा आई, लेकिन इसी बीच वांगचुक और आंदोलनकारी छात्रों के बीच मतभेद भी उभर कर सामने आए। छात्र नेताओं का मानना था कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ही उनकी अंतिम मंजिल है, जबकि वांगचुक का मानना था कि यह संघर्ष अभी जारी रहेगा। अंततः प्रधान का इस्तीफा तो हो गया, लेकिन इस जीत के बाद भी सोनम वांगचुक को पूरी तरह भुला दिया गया, और उन्होंने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में किसी भी राजनीतिक पार्टी या अभिजीत दिपके का नाम नहीं लिया।











