दिल्ली के सदर बाजार में तिरंगा बनाने की परंपरा
अगस्त महीने के करीब आते ही देशभर में तिरंगे की मांग तेजी से बढ़ने लगती है। बाजारों से लेकर घरों और कार्यालयों तक, हर जगह तिरंगे की जरूरत महसूस की जाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे हाथों तक पहुंचने वाला यह राष्ट्रीय ध्वज आखिर कैसे बनता है? दिल्ली के सदर बाजार में एक ऐसी जगह है, जहां इन दिनों दिन-रात तिरंगे का निर्माण किया जा रहा है। इस स्थान की कहानी सिर्फ तिरंगे बनाने की नहीं है, बल्कि यह एक परिवार की सदियों पुरानी विरासत का भी प्रतीक है। यहां कपड़ों के विभिन्न टुकड़ों को जोड़कर देश की गरिमा और सम्मान का प्रतीक तिरंगा तैयार किया जाता है।
परिवार की विरासत और तिरंगा निर्माण का इतिहास
यह परिवार उस समय से तिरंगा बनाने का काम कर रहा है, जब चीन ने भारत पर हमला किया था। उस समय शुरू हुआ यह कार्य आज उनके परिवार की पहचान बन चुका है। दिल्ली के सदर बाजार में तिरंगा बनाने वाले अब्दुल गफ्फार को प्यार से ‘फ्लैग अंकल’ कहा जाता था। अब वे इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके भाई अब्दुल मलिक ने इस परंपरा को संभाल कर रखा है। उनके साथ परिवार के अन्य सदस्य भी इस काम में जुटे हैं, जिसमें उनके दामाद और भाई भी शामिल हैं। स्वतंत्रता दिवस से पहले इस कार्य की गति कई गुना बढ़ जाती है।
तिरंगा बनाने की प्रक्रिया और इसकी खासियत
तिरंगा बनाने की प्रक्रिया कपड़े की कटिंग से शुरू होती है। केसरिया, सफेद और हरे रंग के कपड़ों को निर्धारित अनुपात में काटा जाता है। फिर इन तीनों रंगों को मिलाकर एक साथ जोड़ा जाता है। अंत में सफेद हिस्से के बीच अशोक चक्र लगाया जाता है, जिससे तिरंगे का अंतिम रूप तैयार होता है। इस प्रक्रिया में हर एक हिस्से को सावधानी से जोड़ना जरूरी होता है, ताकि तिरंगा सही आकार और गुणवत्ता का हो। परिवार के सदस्य लंबे समय से इस काम से जुड़े हैं, और यह उनके रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन चुका है। उनके अनुसार, उनके बनाए तिरंगे देश के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ विदेशों तक भी पहुंचते हैं।










