ईडी ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को क्यों चुनौती दी?
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने उस ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती दी है जिसमें जांच प्रक्रिया पर संज्ञान लेने से इनकार किया गया था। इस मामले में अगली सुनवाई मार्च 2026 में निर्धारित की गई है। दोनों संबंधित नेताओं को अपनी-अपनी याचिका का जवाब दाखिल करना अनिवार्य है।
एजेएल और यंग इंडिया के बीच जटिल वित्तीय लेनदेन का खुलासा
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पूछा कि एजेएल क्या है? इस पर ईडी ने बताया कि यह एक गैर-सूचीबद्ध सार्वजनिक कंपनी है, जिसका नाम एसोसिएटेड जर्नल लिमिटेड (एजेएल) है। ईडी ने आगे कहा कि यंग इंडिया की ओर से एजेएल को पत्र भेजा गया था, जिसमें पहले लिए गए ऋण की अदायगी या उसे इक्विटी में बदलने का प्रस्ताव था। यह सब योजनाबद्ध तरीके से एक के बाद एक हुआ है।
2010 से शुरू हुई कहानी और वित्तीय गड़बड़ियों का इतिहास
ईडी ने बताया कि अगस्त 2010 से इस कहानी की शुरुआत होती है। उस समय एजेएल को ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (AICC) ने 90 करोड़ रुपये का ऋण दिया। इसके तुरंत बाद ही कंपनी में निदेशकों की नई नियुक्ति की गई। उस समय एजेएल के पास लगभग 100 करोड़ रुपये की संपत्ति थी। 22 जनवरी 2011 को यंग इंडिया में दो नए निदेशक सोनिया गांधी और राहुल गांधी को शामिल किया गया, जिनके पास कुल 76 प्रतिशत शेयर थे। यंग इंडिया ने एजेएल से पैसे वसूलने का अधिकार भी हासिल किया। बाद में 23 नवंबर 2012 को यंग इंडिया को 5 लाख रुपये की शेयर पूंजी के साथ निगमित किया गया, जिसमें सैम पित्रोदा और दुबे के पास 550-550 शेयर थे।
2016 में डॉ सुब्रह्मण्यन स्वामी ने की थी शिकायत
ईडी ने बताया कि जून 2016 में डॉ सुब्रह्मण्यन स्वामी ने एक निजी शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें आर्थिक हेराफेरी और आईपीसी की धाराओं 420 और 120 बी के तहत आरोप लगाए गए थे। यह अपराध अनुसूचित अपराध हैं, जिन पर संज्ञान लेकर जांच शुरू की गई। अदालत ने इस शिकायत को खारिज कर दिया, लेकिन स्वामी ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में कोई आपत्ति नहीं जताई और जांच की प्रक्रिया को मंजूरी दी। इस पूरे प्रकरण में धनशोधन और अवैध वित्तीय लेनदेन के आरोप शामिल हैं, जिनकी जांच पीएमएलए (प्रिवेंशन ऑफ मनी लांड्रिंग एक्ट) के तहत की गई।










