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क्या RJD के सामने कांग्रेस घुटने टेक रही है? सौ सीटें मांगने के बाद भी सिर्फ 58 पर सिमटी

by लोक आवाज़ 24×7 स्टाफ
10/10/2025
in बिहार
क्या RJD के सामने कांग्रेस घुटने टेक रही है? सौ सीटें मांगने के बाद भी सिर्फ 58 पर सिमटी
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बिहार चुनाव में कांग्रेस की सीटों में कटौती की खबरें

हाल ही में बिहार विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच कांग्रेस पार्टी के सीट बंटवारे को लेकर नई जानकारी सामने आई है। सूत्रों के अनुसार, पिछली बार की तुलना में इस बार कांग्रेस लगभग बारह सीटें कम करने पर सहमत हो गई है। इस खबर को इंडियन एक्सप्रेस (Indian Express) ने अपने अंदरूनी सूत्रों के हवाले से प्रकाशित किया है। 2020 के चुनाव में कांग्रेस को 70 सीटें मिली थीं, जिनमें से केवल 19 पर ही उसकी जीत हुई थी, यानी कि उनका जीतने का प्रतिशत लगभग 27 प्रतिशत था। इस बार, रिपोर्ट्स के मुताबिक, कांग्रेस को लगभग 58 सीटें मिलने की संभावना है, जो कि पिछली बार से करीब 12 सीटें कम हैं। हालांकि, यह निर्णय अभी आधिकारिक रूप से घोषित नहीं हुआ है, लेकिन मल्लिकार्जुन खड़गे (Mallikarjun Kharge) की 8 अक्टूबर की बैठक और तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) से हुई बातचीत के बाद इसे लगभग तय माना जा रहा है। आइए जानते हैं कि आखिर यह बदलाव कैसे आया।

सीटों में कटौती का कारण और राजनीतिक समीकरण

कांग्रेस ने बिहार चुनाव से पहले अपने वोटर लिस्ट (SIR) का विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (Special Intensive Revision) का मुद्दा जोरशोर से उठाया था। पार्टी का आरोप था कि चुनाव आयोग और केंद्र सरकार मिलकर मतदाता सूचियों से अल्पसंख्यकों और दलितों के नाम हटा रहे हैं। इस मुद्दे पर राहुल गांधी (Rahul Gandhi) और तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) की वोटर अधिकार यात्रा भी इसी एजेंडे पर केंद्रित थी। शुरुआत में यह मुद्दा कांग्रेस के लिए एक बड़ा नैरेटिव बन गया था, जिससे ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वह राजद (RJD) की छाया से बाहर निकलकर अपने स्वतंत्र एजेंडे के साथ जनता से जुड़ने का प्रयास कर रही है।
लेकिन जब चुनाव आयोग ने आंकड़े जारी किए और स्पष्ट हुआ कि नाम हटाने की प्रक्रिया सामान्य थी, तो यह विवाद ठंडा पड़ गया। कांग्रेस का आरोप तथ्यात्मक रूप से कमजोर साबित हुआ और जनता के बीच इसकी विश्वसनीयता कम हो गई। इस विवाद के चलते कांग्रेस को वह राजनीतिक स्थान नहीं मिल पाया, जिसकी उम्मीद थी। वहीं, आरजेडी ने इस मुद्दे पर अधिक ध्यान नहीं दिया, और तेजस्वी यादव ने अपनी यात्रा फिर से शुरू कर इस विषय पर चर्चा नहीं की।
ऐसे में कांग्रेस को यह समझ में आ गया कि तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राजद का वोट बैंक, खासकर यादव, मुस्लिम और पिछड़ा वर्ग, अभी भी उनके साथ है। जबकि कांग्रेस का प्रभाव सीमांचल और कुछ पारंपरिक सीटों तक ही सीमित रह गया है। यही कारण है कि सीट बंटवारे की बातचीत में आरजेडी ने आक्रामक रुख अपनाया, और कांग्रेस को समझौता करना पड़ा।

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क्यों कांग्रेस ने कम सीटें स्वीकार की?

कांग्रेस समर्थकों का मानना है कि इस बार पार्टी ने कम सीटें लेने का फैसला इसलिए किया क्योंकि उसे जीतने वाली सीटें मिल रही हैं। कांग्रेस का कहना है कि पिछली बार आरजेडी ने उन्हें 70 सीटें दी थीं, लेकिन उनमें से अधिकतर ऐसी थीं जहां जीत की संभावना कम थी। साथ ही, कांग्रेस के पास आरजेडी के अलावा कोई वैकल्पिक गठबंधन भी नहीं था, जिससे उसकी बार्गेनिंग क्षमता सीमित हो गई।
इसके अलावा, कांग्रेस के पास न तो स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने की ताकत है और न ही बिहार में मजबूत संगठन। अधिकतर सीटों पर उसके पास प्रभावशाली स्थानीय नेता या बूथ स्तर का नेटवर्क नहीं है। ऐसे में, उसके पास आरजेडी के साथ समझौता करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।

नई राजनीतिक ताकतें और गठबंधन का प्रभाव

प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) की अगुवाई वाली जन सुराज पार्टी (Jansuraj Party) ने बिहार की राजनीति में तीसरे विकल्प के रूप में अपनी पहचान बनाई है। यह पार्टी अभी नई है, लेकिन उसके मुद्दे जैसे सुशासन, रोजगार, पलायन और शिक्षा सुधार उन वर्गों को आकर्षित कर रहे हैं, जो पारंपरिक रूप से कांग्रेस के वोट बैंक में शामिल थे। खासकर युवा, शहरी और मध्यम वर्ग के मतदाता इस पार्टी की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
जन सुराज पार्टी के उभार से महागठबंधन का वोट बैंक बिखरने का खतरा बढ़ गया है। यह स्थिति आरजेडी के लिए चुनौती है, लेकिन कांग्रेस के लिए तो यह अस्तित्व का सवाल बन गई है। राजद का मानना है कि उसका मुख्य वोटर अभी भी स्थिर है, लेकिन कांग्रेस के पास न तो जातीय आधार स्पष्ट है और न ही कोई करिश्माई नेता। इस कारण, कांग्रेस ने गठबंधन में सीमित हिस्सेदारी स्वीकार कर ली है।
2020 के मुकाबले इस बार महागठबंधन में सहयोगी दलों की संख्या भी बढ़ी है। अब इसमें वाम दलों, विकासशील इंसान पार्टी (VIP) जैसे क्षेत्रीय दलों और छोटे सामाजिक समूहों को भी जगह दी जा रही है। इससे कांग्रेस पर दबाव बढ़ा है, क्योंकि रजद (RJD) अपने अधिक सीटें चाहती है, जबकि कांग्रेस को मोलभाव की गुंजाइश कम मिल रही है।
अखबार के सूत्रों के अनुसार, इस बार कांग्रेस के 17 में से 15 मौजूदा विधायकों को टिकट मिल रही है, जबकि दो के नाम अभी होल्ड पर हैं। संभव है कि इन सीटों पर नए उम्मीदवार उतारे जाएं या फिर सहयोगी पार्टी के साथ सीटें बदली जाएं। 2020 के चुनाव में कांग्रेस ने 70 सीटों में से 19 जीती थीं, जिनमें से दो विधायक बाद में पार्टी छोड़कर भाजपा (BJP) के टिकट पर चुनाव लड़ सकते हैं।

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