बिहार विधानसभा चुनाव की अंतिम तिथि और महागठबंधन की स्थिति
बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान के लिए नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि अब केवल दो दिन दूर है, जो कि 17 अक्टूबर निर्धारित है। इस बीच, महागठबंधन (जिसमें आरजेडी, कांग्रेस, वाम दल और अन्य छोटे सहयोगी दल शामिल हैं) अभी तक सीट बंटवारे का स्पष्ट ऐलान नहीं कर पाया है। यह देरी न केवल गठबंधन की एकता पर सवाल खड़े कर रही है, बल्कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को चुनावी लाभ भी पहुंचा रही है। एनडीए ने 12 अक्टूबर को ही अपने सीट बंटवारे की घोषणा कर दी थी, जिसमें जेडीयू और भाजपा को 101-101 सीटें दी गई हैं, जबकि लोजपा (एलजेपी) को 29 सीटें मिली हैं। हालांकि, अभी भी कुछ सीटों को लेकर एनडीए के भीतर मतभेद जारी हैं, लेकिन मुख्य मुद्दों पर सहमति बन चुकी है।
महागठबंधन में सीट बंटवारे का विवाद और प्रमुख मुद्दे
महागठबंधन के सबसे बड़े विवाद का कारण कांग्रेस का रुख है, जो आरजेडी के साथ सीटों को लेकर अड़ी हुई है। कांग्रेस 70 सीटों की मांग कर रही है, जो 2020 के चुनाव जैसी ही है, जबकि आरजेडी 52 से 58 सीटें देने को तैयार है। खबरें थीं कि कांग्रेस 58 मजबूत सीटों के साथ तैयार हो गई है, लेकिन फिर बात बिगड़ गई। पहले चरण के लिए नामांकन दाखिल करने में अब केवल दो दिन बचे हैं, लेकिन अभी तक उम्मीदवारों के नाम तय नहीं हो सके हैं। साथ ही, तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का आधिकारिक चेहरा घोषित न करने का मुद्दा भी चर्चा में है। तेजस्वी खुद को सीएम का चेहरा घोषित कर रहे हैं, पर सहयोगी दल कांग्रेस उनके नाम पर सहमति नहीं दे रही है, जिससे गठबंधन में असहजता स्पष्ट है।
पिछले चुनावों का विश्लेषण और कांग्रेस की भूमिका
पिछले विधानसभा चुनावों का विश्लेषण करें तो महागठबंधन को इस बार नेतृत्व करना चाहिए था, लेकिन कांग्रेस की देरी और लापरवाही ने स्थिति को जटिल बना दिया है। कांग्रेस की यह सुस्ती सहयोगी दलों के लिए चिंता का विषय बन गई है। अभी तक आरजेडी ने 71 उम्मीदवारों के नाम घोषित किए हैं, जबकि भाकपा माले ने 18 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे हैं। सीपीआई ने 6 उम्मीदवारों की सूची जारी की है, और कुछ सीटों पर सहमति के बाद उम्मीदवार उतारने का दावा भी किया है। इस बीच, राहुल गांधी की विदेश यात्रा ने भी महागठबंधन की चुनावी रणनीति को प्रभावित किया है। राहुल गांधी का 10 दिन का विदेश दौरा, खासकर बिहार चुनाव के समय, पार्टी और गठबंधन के लिए नुकसानदायक साबित हो रहा है। कांग्रेस की इस अनुपस्थिति से सीट बंटवारे और उम्मीदवार चयन में देरी हो रही है, जो चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकती है।










