बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का प्रभावशाली स्थान
बिहार में पिछले दो दशकों से मुख्यमंत्री पद पर काबिज नीतीश कुमार का राजनीतिक वर्चस्व किसी से छुपा नहीं है। यहां की राजनीति में उनका दबदबा इतना मजबूत है कि विपक्षी दल भी उनके खिलाफ कोई बड़ा कदम उठाने से पहले सोचते हैं। बिहार के दूर-दराज इलाकों से आए युवाओं से लेकर विभिन्न सामाजिक वर्गों तक, नीतीश कुमार की लोकप्रियता अभी भी कायम है। खास बात यह है कि राज्य के युवा और महिला वोटर उनके साथ मजबूती से खड़े हैं, जो उनकी राजनीतिक ताकत का बड़ा आधार हैं।
राजनीतिक रणनीति और वोट बैंक का मजबूत आधार
नीतीश कुमार ने अपने राजनीतिक करियर में ईबीसी (Economically Backward Classes) और महिला वोटर्स का बड़ा समर्थन हासिल किया है। उन्होंने बिहार में अपनी एक अलग पहचान बनाई है, जिसे दिल्ली में बैठे राजनीतिक विश्लेषक भी समझ नहीं पाते। यही कारण है कि राष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी अहमियत बनी रहती है। हाल ही में गृहमंत्री अमित शाह का पटना आकर उनके घर मिलना इस बात का संकेत है कि बिहार की राजनीति में उनका स्थान अभी भी अडिग है। शाह का यह कदम इस बात का भी संकेत है कि बिहार में सरकार बनाने की प्रक्रिया में अभी भी नीतीश कुमार का वर्चस्व कायम है।
एनडीए में सीट बंटवारे और राजनीतिक समीकरण
बिहार में एनडीए का सीट बंटवारा स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि जनता दल यूनाइटेड (JDU) को नजरअंदाज करना आसान नहीं है। 243 सीटों में बीजेपी और जेडीयू को बराबर 101-101 सीटें मिली हैं, जो दोनों पार्टियों के बीच मजबूत गठबंधन का संकेत है। इस समीकरण से यह भी पता चलता है कि नीतीश कुमार की राजनीतिक पकड़ कितनी मजबूत है। वहीं, लोजपा (रामविलास) को 29 सीटें और HAM-RLM को 6-6 सीटें मिली हैं, जो विपक्षी दलों का आरोप है कि नीतीश कुमार को बाहर करने की साजिश रची जा रही है। परंतु, 2020 के चुनाव में भी जब बीजेपी ने अधिक सीटें जीती थीं, तब भी नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया गया था। इसका अर्थ है कि उनकी राजनीतिक स्थिति अभी भी मजबूत है।
नीतीश कुमार का राजनीतिक कद और भविष्य की संभावनाएं
नीतीश कुमार का राजनीतिक कद इतना बड़ा है कि यदि वे चाहें तो महागठबंधन का हिस्सा बन सकते हैं। बिहार में उनकी लोकप्रियता और सामाजिक आधार उन्हें किसी भी गठबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का अवसर प्रदान करता है। दूसरी ओर, बीजेपी के पास उनके मुकाबले कोई ऐसा नेता नहीं है जो उनके बराबर जनता के बीच पैठ बना सके। फडणवीस जैसे नेता महाराष्ट्र में अपनी पहचान रखते हैं, पर बिहार में नीतीश कुमार का स्थान अलग ही है। चुनाव के बाद भी उनका महत्व बना रहेगा, क्योंकि वे बिहार की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेता हैं।
अमित शाह का बयान और राजनीतिक हलचल
गृहमंत्री अमित शाह का पटना में नीतीश कुमार से मिलना राजनीतिक हलचल का कारण बना है। विपक्ष ने इस मुलाकात को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाई हैं। पर शाह ने स्पष्ट कर दिया है कि नीतीश कुमार ही एनडीए के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार रहेंगे। उन्होंने कहा कि 2020 के चुनाव में भी नीतीश कुमार को ही मुख्यमंत्री बनाया गया था और इस बार भी गठबंधन का सम्मान कायम रहेगा। शाह ने यह भी कहा कि नीतीश का स्वास्थ्य ठीक है और उनके राजनीतिक जीवन में कोई समस्या नहीं है। इस बयान से यह साफ हो गया है कि बिहार में नीतीश कुमार का स्थान अभी भी अडिग है और उनकी भूमिका भविष्य में भी महत्वपूर्ण बनी रहेगी।










