सुप्रीम कोर्ट में बिहार वोटर लिस्ट संशोधन पर सुनवाई का राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय संदर्भ
सुप्रीम कोर्ट में बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़ी याचिका पर चल रही सुनवाई के दौरान अमेरिका के न्यायिक तंत्र और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का उल्लेख हुआ। इस मामले की सुनवाई के दौरान शुरुआत में बिहार की वोटर लिस्ट में संशोधन की प्रक्रिया पर चर्चा हुई, लेकिन जल्द ही यह मामला ‘ड्यू प्रोसेस’ और विश्वभर के उदाहरणों की ओर मुड़ गया।
वोटर लिस्ट संशोधन में मनमाने नाम हटाने का खतरा और अंतरराष्ट्रीय उदाहरण
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि बिहार में वोटर लिस्ट में संशोधन के दौरान लाखों मतदाताओं के नाम बिना उचित प्रक्रिया के हटा दिए जा सकते हैं। इस संदर्भ में उन्होंने अमेरिका समेत अन्य देशों के न्यायिक निर्णयों का हवाला देते हुए ‘ड्यू प्रोसेस’ का उल्लेख किया। वहीं, चुनाव आयोग ने इन तर्कों पर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि विदेशी मामलों को भारत में लागू करना उचित नहीं है। आयोग के वकील ने स्पष्ट किया कि अमेरिका जैसे विकसित देश में भी ‘ड्यू प्रोसेस’ की परिभाषा विवादास्पद है।
अमेरिका के उदाहरण और भारत में चुनावी प्रक्रिया का विशिष्ट स्वरूप
चुनाव आयोग ने यह भी बताया कि भारत में चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह संविधान और कानून के तहत संचालित होती है। अनुच्छेद 324 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के अंतर्गत आयोग को मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने का अधिकार है, जिसमें मृत, स्थानांतरित या डुप्लिकेट मतदाताओं को हटाना शामिल है। यह प्रक्रिया नागरिकता का निर्धारण नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान पूछा कि क्या यह प्रक्रिया नागरिकता निर्धारण की सीमा में आ रही है, तो अदालत ने स्पष्ट किया कि नागरिकता से जुड़े सवाल विधायी प्रावधानों के अंतर्गत आते हैं।
अदालत ने आधार कार्ड को पहचान का दस्तावेज मानते हुए यह भी कहा कि यह नागरिकता का प्रमाण नहीं है। साथ ही, किसी मतदाता का नाम हटाने से पहले प्राकृतिक न्याय और पारदर्शी प्रक्रिया का पालन जरूरी है। इस मामले का अंतिम फैसला बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे देश में वोटर लिस्ट संशोधन की दिशा तय करेगा। अगली सुनवाई 28 जनवरी को होगी।









