बिहार में राज्यसभा चुनाव का राजनीतिक परिदृश्य बदल रहा है
बिहार की पांच राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव की घोषणा हो चुकी है, जिससे राज्य की सियासी हलचल तेज हो गई है। विधानसभा चुनाव के बाद राजनीतिक समीकरणों में बदलाव आया है, और अब सत्तापक्ष यानी एनडीए आसानी से चार सीटें जीत सकता है। हालांकि, असली मुकाबला पांचवी सीट को लेकर है, जो सियासी जंग का मुख्य केंद्र बन गई है।
राज्यसभा चुनाव की रणनीति और सियासी समीकरण
बिहार की पांच सीटें 9 अप्रैल 2026 को खाली हो रही हैं, और चुनाव आयोग ने 16 मार्च को मतदान की तारीख तय की है। इनमें से कुछ सदस्यों का कार्यकाल पूरा हो रहा है, जैसे आरजेडी के प्रेम चंद गुप्ता और एनडी सिंह, जेडीयू के हरिवंश नारायण सिंह और रामनाथ ठाकुर, साथ ही बीजेपी समर्थित आरएलएम के उपेंद्र कुशवाहा का भी कार्यकाल समाप्त हो रहा है। इन सबके कारण इन सीटों पर चुनाव जरूरी हो गया है।
2025 के विधानसभा चुनाव के बाद बिहार की राजनीतिक स्थिति पूरी तरह से बदल गई है। इस बार राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए कम से कम 41 विधायकों का समर्थन आवश्यक है, क्योंकि बिहार विधानसभा में कुल 243 सीटें हैं। वर्तमान में एनडीए के पास 202 विधायक हैं, जबकि इंडिया गठबंधन के पास केवल 35 विधायक हैं। इस आधार पर एनडीए चार सीटें आसानी से जीत लेगा, जिसमें दो बीजेपी और दो जेडीयू के खाते में जाएंगी।
सात विधायकों का महत्व और सियासी दांवपेच
बिहार विधानसभा में कुल 243 विधायकों में से एनडीए के पास 202 और महागठबंधन के पास 35 विधायक हैं। शेष सात विधायक, जिनमें पांच ओवैसी की AIMIM पार्टी के हैं, एक बसपा विधायक और एक आईपी गुप्ता हैं। ये सात विधायक किसी भी पार्टी के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं, खासकर पांचवीं सीट के सियासी मुकाबले में। यदि एनडीए इन सात विधायकों का समर्थन हासिल कर लेता है, तो वह आसानी से पांचवीं सीट जीत सकता है। वहीं, विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक इन सात विधायकों में से समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहा है, ताकि वह भी इस सीट पर कब्जा कर सके।
अंततः, इन सात विधायकों का समर्थन न मिलने पर न ही एनडीए और न ही इंडिया ब्लॉक पांचवीं सीट जीत पाएंगे। एनडीए को इस सीट के लिए केवल तीन विधायकों का समर्थन चाहिए, जबकि महागठबंधन को छह विधायकों का समर्थन चाहिए। इस सियासी खेल में हर कदम फूंक-फूंक कर रखा जा रहा है।










