आरोपी की बरी होने का पीड़ित पर प्रभाव
किसी भी स्थिति में आरोपी का बरी होना पीड़ित के दर्द और नुकसान को समाप्त नहीं कर सकता। इस बात को ध्यान में रखते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है कि आरोपी को संदेह का लाभ मिल सकता है, लेकिन पीड़ित को जीवन में राहत और शांति नहीं मिलती। कोर्ट ने मुआवजे की राशि भी पहले के 37 लाख रुपये से बढ़ाकर 53 लाख रुपये कर दी है।
संबंधित अदालतों के फैसले और मुआवजे का महत्व
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट ने सड़क दुर्घटनाओं और अन्य मामलों से जुड़े मुआवजे के संबंध में अहम निर्णय सुनाए हैं। इन अदालतों ने स्पष्ट किया है कि आपराधिक और सिविल (मुआवजा) मामलों का कानूनी ढांचा अलग है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि आपराधिक अदालत में बरी होने का अर्थ यह नहीं है कि लापरवाही नहीं हुई।
बरी होने का मतलब ‘क्लीन चिट’ नहीं है, मुआवजे का अधिकार बना रहता है
दिल्ली हाई कोर्ट में जस्टिस दयाल ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि आरोपी ड्राइवर का बरी होना कोई ‘क्लीन चिट’ नहीं है। इसलिए, इस आधार पर पीड़ित का मुआवजा रद्द नहीं किया जा सकता। हाई कोर्ट ने इस याचिका को खारिज करते हुए मुआवजे को जारी रखा और पीड़ित की दिव्यांगता को ध्यान में रखते हुए राशि को 37 लाख से बढ़ाकर 53 लाख रुपये कर दिया।










