सोयतकलां में डोल ग्यारस का भव्य आयोजन
आगर मालवा के प्रसिद्ध नगर सोयतकलां में जलझूलनी एकादशी यानी डोल ग्यारस का उत्सव बड़े ही धूमधाम और श्रद्धा के साथ मनाया गया। इस खास अवसर पर नगर के विभिन्न मंदिरों से श्री बालकृष्ण के तीन दर्जन से अधिक बाल विग्रह आकर्षक देव-विमानों में सजे हुए निकले। इन देव-विमानों को माधव चौक पर महाआरती के बाद कंठाल नदी तक लाया गया, जहां परंपरानुसार इन्हें नदी के जल में तैराया गया। इस दौरान नीलकंठ महादेव मंदिर में पूजा-अर्चना का आयोजन भी हुआ।
देव-विमानों का नगर भ्रमण और धार्मिक अनुष्ठान
सभी देव-विमानों को फिर नगर के मध्य स्थित माधव चौक पर लाया गया, जहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ ने भगवान के बाल स्वरूपों का दर्शन किया। यहां तीन महाआरती और महाअभिषेक का आयोजन हुआ, जिसमें श्रद्धालु उत्साह से भागीदारी कर रहे थे। घंटियों की झंकार, भजन-कीर्तन और जय श्रीकृष्ण के जयकारे से पूरा माहौल भक्तिमय हो गया। इस आयोजन की सबसे खास बात थी सामूहिक देव-दर्शन, जब एक साथ तीन दर्जन से अधिक बाल विग्रह देव-विमानों में विराजमान होकर नगर में निकले। श्रद्धालुओं ने इन देव-विमानों की पूजा की और अपनी मनोकामनाएं भगवान के समक्ष रखीं।
नदी में जल विहार और रात का भव्य आतिशबाजी कार्यक्रम
नगर भ्रमण के बाद देव-विमान भजन-कीर्तन करते हुए कंठाल नदी की ओर बढ़े। नदी के तट पर पहुंचकर फिर से भगवान की आरती की गई और परंपरानुसार देव-विमानों को नदी के जल में तैराया गया। नदी की लहरों पर सजे हुए देव-विमान और उनके बीच विराजमान भगवान के बाल स्वरूप का दृश्य अत्यंत मनमोहक था। हजारों श्रद्धालु इन पावन क्षणों को अपने मोबाइल कैमरों में कैद करते नजर आए। यह जल विहार आयोजन का सबसे आकर्षक हिस्सा रहा, जिसने सोयतकलां के डोल ग्यारस उत्सव को विशिष्ट पहचान दी।
रात्रि में नदी किनारे रोशनी का मनमोहक नजारा भी देखने को मिला। नगर परिषद की ओर से भव्य आतिशबाजी का आयोजन किया गया, जिसमें रंग-बिरंगी रोशनी आकाश को जगमगा रही थी। नीचे नदी और आसपास मौजूद श्रद्धालु इस दृश्य का आनंद ले रहे थे। पूरे दिन चले इस धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन का अंतिम चरण भी श्रद्धालुओं के बीच उत्साह और भक्ति का माहौल बनाकर समाप्त हुआ।
सोयतकलां में जलझूलनी एकादशी का यह परंपरागत उत्सव यह दर्शाता है कि कुछ पर्व केवल तिथियों का नाम नहीं होते, बल्कि वे पीढ़ियों से चली आ रही आस्था, संस्कृति और सामूहिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन जाते हैं। डोल ग्यारस का यह त्योहार भी इसी परंपरा का प्रतीक है, जब हर साल अलग-अलग मंदिरों में विराजित बालकृष्ण एक साथ नगर में निकलते हैं, नदी में जल विहार करते हैं और पूरा शहर भक्ति के रंग में रंग जाता है।









