2022 में कॉलेज फ्रेशर्स की शुरुआत से ही दीपांशु शौकीन का सफर
साल 2022 में शहीद भगत सिंह कॉलेज (इवनिंग) की फ्रेशर्स पार्टी के दौरान एक युवा छात्र ने अपने आत्मविश्वास का परिचय दिया। उस समय वह केवल एक सामान्य फ्रेशर था, जिसने मंच पर कह दिया था कि आज अकेले चल रहा हूं, लेकिन एक दिन जरूर काफिला मेरे पीछे होगा। इस डायलॉग पर खूब तालियां बजीं और उसकी वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। उस वक्त उसकी पहचान खास नहीं थी, बस एक कॉलेज का छात्र था।
चार साल बाद, यानी 2026 में, वही छात्र अपने उस वक्त के वाक्य को साकार कर चुका है। दीपांशु शौकीन नाम का यह युवा अब दिल्ली विश्वविद्यालय (Delhi University) के वाइस प्रेसिडेंट के पद पर आसीन है। उसने अपने संघर्ष और मेहनत से न केवल इस पद को हासिल किया, बल्कि 72 साल पुराने रिकॉर्ड को भी तोड़ दिया है।
दीपांशु शौकीन की जीत के पीछे मुख्य कारण और राजनीतिक प्रभाव
दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति में दीपांशु शौकीन का नाम तेजी से उभर रहा है। वह पहली बार निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में उपाध्यक्ष पद पर चुनाव लड़ा और 30,615 वोट प्राप्त किए। दूसरे स्थान पर रहे ABVP के ईशू मौर्य को 16,910 वोट और NSUI के वीर चतरथ को मात्र 4,313 वोट मिले। यह जीत खासतौर पर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दिल्ली विश्वविद्यालय में पहले कभी भी निर्दलीय उम्मीदवार उपाध्यक्ष पद नहीं जीत पाया था।
इस सफलता के पीछे कई कारण हैं, जिनमें से मुख्य हैं चार साल की मेहनत, छात्र समुदाय का समर्थन, और अपनी सादगी भरी छवि। दीपांशु ने कॉलेज के दौरान विभिन्न गतिविधियों में भाग लिया, NSUI से जुड़कर सक्रियता दिखाई, और अपने पुराने कार्यों को सोशल मीडिया पर बार-बार याद दिलाया। साथ ही, उसने अपने परिवार की सामान्य पृष्ठभूमि और संघर्ष को भी उजागर किया, जो उसकी जीत को और भी खास बनाता है।
दीपांशु की अनूठी छवि और चुनावी रणनीति
दिल्ली के पीरागढ़ी इलाके से आने वाले दीपांशु का परिवार साधारण है। पिता दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन (DTC) में बस कंडक्टर हैं, जबकि मां आंगनवाड़ी में काम करती हैं। उनके पास न तो राजनीतिक रसूख था और न ही बड़े पैसों का जखीरा। यह बात उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाती है, जो अक्सर पैसे और पावर का इस्तेमाल कर चुनाव जीतते हैं।
अपनी सादगी और आम छात्रों से जुड़ाव के कारण दीपांशु ने खुद को एक नई पहचान दी है। वह कहते हैं कि मेट्रो, बस या ई-रिक्शा से आने वाले छात्र उनके जैसे नेता को समझ नहीं सकते, क्योंकि उनके पास न तो महंगी गाड़ियां हैं और न ही बड़े संसाधन। वह अपने प्रचार में महंगी गाड़ियों का प्रयोग नहीं करते, बल्कि अपने समर्थकों की गाड़ियों का ही इस्तेमाल करते हैं।
चुनाव प्रचार के दौरान दीपांशु ने एक अनूठा कदम उठाया। 6 सितंबर को सत्य निकेतन में हुई एक दुर्घटना के बाद, उसने पीड़ितों के समर्थन में जूते-चप्पल न पहनने का संकल्प लिया। वह कहते हैं कि जब तक पीड़ितों को न्याय नहीं मिल जाता, वह नंगे पैर ही प्रचार करेंगे। इस वादे को निभाते हुए वह चुनाव तक नंगे पैर ही प्रचार करते रहे, जिससे उनकी सादगी और समर्पण का संदेश गया।










