मध्य प्रदेश की लाड़ली बहना योजना पर हाईकोर्ट में उठे सवाल
मध्य प्रदेश में लागू लाड़ली बहना योजना को लेकर अब उच्च न्यायालय में गंभीर प्रश्न खड़े किए गए हैं। इस योजना की प्रभावशीलता, सरकारी खजाने पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ और महिलाओं को दी जा रही वित्तीय सहायता के उपयोग को लेकर एक जनहित याचिका दायर की गई है। ग्वालियर की बेंच ने इस मामले में राज्य सरकार को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब देने का निर्देश दिया है। इस याचिका में योजना से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाया गया है, जिसमें योजना के लाभार्थियों, भुगतान की प्रक्रिया और वित्तीय रिकॉर्ड की पारदर्शिता भी शामिल है।
सरकारी खर्च और योजना के आर्थिक प्रभाव पर सवाल
याचिकाकर्ता ने सरकारी धन के उपयोग को लेकर चिंता व्यक्त की है। वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल मिश्रा का तर्क है कि महिलाओं के कल्याण के नाम पर खर्च हो रहे सरकारी संसाधनों का उपयोग रोजगार सृजन और स्थायी आर्थिक अवसरों के निर्माण में किया जा सकता था। उनका मानना है कि यदि सरकार का उद्देश्य महिलाओं का सशक्तिकरण है, तो इसके बजाय उद्योग-धंधे और स्वरोजगार के अवसर पैदा किए जाने चाहिए थे। मिश्रा का यह भी कहना है कि रोजगार के माध्यम से आर्थिक गतिविधियों को स्थिर किया जा सकता है, जिससे महिलाओं को दीर्घकालिक लाभ मिल सके। उन्होंने यह भी सवाल उठाया है कि सरकार इस योजना से क्या हासिल कर रही है, इसे स्पष्ट किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, सीधे नकद राशि देने के बजाय यदि महिलाओं को स्वरोजगार के अवसर प्रदान किए जाते, तो इससे आर्थिक चक्र मजबूत होता।
सरकार की वित्तीय स्थिति और योजना का राजनीतिक संदर्भ
मिश्रा ने यह भी दावा किया है कि हर महीने करीब 1900 करोड़ रुपये इस योजना पर खर्च किए जा रहे हैं। उन्होंने सरकारी खजाने की वर्तमान स्थिति पर भी सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि यदि इस धनराशि को कर्ज लेकर वितरित किया जाएगा, तो बेरोजगारी और बढ़ सकती है। उनका मानना है कि जनता के टैक्स से प्राप्त धन का उपयोग विकास, शिक्षा और रोजगार जैसे क्षेत्रों में होना चाहिए। वकील ने यह भी बताया कि मध्य प्रदेश पर लगभग 3.08 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है, जो इस योजना के आर्थिक प्रभाव का एक हिस्सा है। इन दलीलों का अभी सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं आया है। साथ ही, याचिकाकर्ता ने यह भी सवाल उठाया है कि योजना मार्च 2023 में लागू की गई थी, उस समय चुनाव का माहौल था, और इसे चुनावी तोहफे के रूप में देखा जा रहा है। इस पर भी सरकार का पक्ष अभी स्पष्ट नहीं है।









