कोसी नदी की बाढ़ ने मदरौनी गांव को जकड़ा
यह तस्वीर केवल बाढ़ की स्थिति को दर्शाने वाली नहीं है, बल्कि उस लंबे इंतजार की भी कहानी कहती है जो पिछले पंद्रह वर्षों से खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। नवगछिया (Naugachhia) के रंगरा प्रखंड का मदरौनी गांव पिछले करीब बीस दिनों से कोसी (Kosi) नदी के बाढ़ के पानी में पूरी तरह से डूबा हुआ है। गांव की सड़कों और घरों में पानी भर चुका है, और वे रास्ते भी अब पानी की लहरों से घिरे हुए हैं, जिन पर कभी बच्चे खेलते थे। घरों से उठने वाला धुआं अब पानी में डूबा हुआ है, और लोग अपनी जिंदगी बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
बाढ़ का कहर और ग्रामीणों की जद्दोजहद
बाढ़ का पानी घरों के अंदर तक पहुंच चुका है, जिससे करीब 1500 से अधिक परिवार प्रभावित हैं। इनमें से 700 से अधिक परिवार बाढ़ की मार झेल रहे हैं। इस प्राकृतिक आपदा ने ग्रामीणों की रोजमर्रा की जिंदगी को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। घर से बाहर निकलना भी कठिन हो गया है, और आवश्यक वस्तुओं के लिए भी पानी के बीच से गुजरना पड़ रहा है। बाढ़ ने न केवल घरों में पानी भर दिया है, बल्कि लोगों का जीवन का रास्ता भी रोक दिया है। कई लोग अपने घर की छत पर दिन बिता रहे हैं, तो कुछ रेलवे ट्रैक के किनारे आशियाना बनाने को मजबूर हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक के लिए हर कदम चुनौतीपूर्ण हो गया है। राशन, दवाइयां या अन्य जरूरी सामान के लिए भी पानी के बीच से गुजरना पड़ रहा है। सड़कें पूरी तरह से डूब चुकी हैं और गांव का संपर्क भी प्रभावित है। इन कठिनाइयों के बीच नाव ही लोगों के जीवन का सहारा बन गई है।
स्थायी समाधान की आस और बांध का इंतजार
ग्रामीणों का आरोप है कि लगभग पंद्रह साल पहले टूटे रिंग बांध का निर्माण आज तक पूरा नहीं हो पाया है। यदि यह बांध मजबूत बना होता, तो मदरौनी, सहोड़ा, बनिया और सधुआ चापर पंचायतों के लाखों लोग हर साल बाढ़ से राहत पा सकते थे। इन इलाकों की आबादी हर साल बाढ़ की चपेट में आती है, जिससे घर, रास्ते और जीवन प्रभावित होते हैं। बावजूद इसके, वर्षों से कोई स्थायी समाधान नहीं निकला है। ग्रामीणों का कहना है कि बाढ़ के दौरान उन्हें राहत सामग्री भी नहीं मिल पाती, न ही सूखा राशन या पशु चारे की व्यवस्था की जाती है। सामुदायिक रसोईघर भी अभी तक शुरू नहीं हो पाया है। इन सबके बीच, पानी में फंसे परिवारों को अपने घर और सामान बचाने के साथ-साथ भोजन और आवश्यक वस्तुओं की चिंता सताती रहती है।
मदरौनी और आसपास के इलाकों में बाढ़ कोई नई समस्या नहीं है। हर साल अगस्त से नवंबर तक बाढ़ का खतरा बना रहता है। घर डूबते हैं, फसलें बर्बाद होती हैं और नाव ही सबसे बड़ा सहारा बन जाती है। इसके बाद राहत का इंतजार शुरू होता है। साल दर साल यही कहानी दोहराई जाती है, जिसमें पानी आता है और लोगों की जिंदगी ठहर जाती है। ग्रामीणों का कहना है कि इतने वर्षों के बाद भी बाढ़ से बचाव का स्थायी समाधान नहीं मिल पाया है। अब सवाल सिर्फ राहत का नहीं, बल्कि स्थायी समाधान का है।
वर्तमान में बाढ़ से जूझ रहे लोगों को नाव, भोजन, पेयजल और जरूरी राहत सामग्री की आवश्यकता है, लेकिन उनकी सबसे बड़ी मांग है रिंग बांध का स्थायी निर्माण। क्योंकि यह समस्या सिर्फ इस साल की बाढ़ की नहीं है, बल्कि वह 15 साल पुराना इंतजार है, जिसका अंत अभी तक नहीं हुआ है। हर साल वही खतरा फिर से खड़ा हो जाता है, और हर बार लोगों को पानी के बीच अपनी जिंदगी बचानी पड़ती है। मदरौनी इस समय पानी में डूबा हुआ है, घरों में पानी है, रास्ते डूबे हैं और जीवन कठिनाइयों से घिरा है। लेकिन इस पानी के बीच एक सवाल भी लगातार तैर रहा है- वह 15 साल से जिस बांध के बनने का इंतजार है, वह आखिर कब पूरा होगा?











