कांवड़ यात्रा का वर्तमान स्वरूप और चुनौतियां
सावन के महीने में कांवड़ यात्रा अपने चरम पर है, और सोशल मीडिया पर इन यात्राओं की झलकियां तेजी से वायरल हो रही हैं। फेसबुक और Instagram पर कांवड़ियों की Reels वीडियो से भरे पड़े हैं, जिनमें कई भक्त भक्ति में डूबे हुए नजर आते हैं। कुछ भक्त तो हटके अंदाज में कांवड़ लेकर दिख रहे हैं, जिनके देखने वाले भी रुककर तारीफ किए बिना नहीं रह पाते।
लेकिन इन वायरल वीडियो के पीछे की असली कहानी क्या है? रास्ते में कांवड़ियों के लिए क्या इंतजाम किए गए हैं? खाने-पीने, रहने, मेडिकल सहायता और सुरक्षा जैसी जरूरी व्यवस्थाओं का क्या हाल है? इन सवालों के जवाब जानने के लिए हम दिल्ली के यमुना विहार पहुंचे, जहां क्षत्रिय कांवड़ सेवा शिविर का आयोजन किया गया है।
यात्रा की तैयारियों और युवा भागीदारी का विश्लेषण
शिविर में हर उम्र के लोग मौजूद थे, लेकिन खासतौर पर युवाओं की संख्या अधिक थी। मैंने हंसते हुए पास खड़े कांवड़ियों से कहा, “लगता है इस बार Gen-Z भी बड़ी संख्या में कांवड़ लेने पहुंचे हैं।” तभी एक नकाब पहने भोले ने अपना मास्क उतारा और कहा, “हम जंतर-मंतर वाले नहीं हैं, हमें Gen-Z मत कहो।” उसने स्पष्ट किया कि वह 250 किलोमीटर पैदल चलकर गंगाजल लाए हैं और उन्हें उन लोगों से अलग माना जाए जो दो किलोमीटर भी ओला-रैपिडो से यात्रा करते हैं।
यह बात छोटी जरूर थी, लेकिन इसकी गहराई में जाकर पता चला कि यह भोला अपनी उम्र में Gen-Z के ही समान था, लेकिन खुद को इस टैग से जोड़ना नहीं चाहता था। वहीं, एक और भोला ध्रुव ने कहा, “जब तक बात छात्रों की थी, हम सपोर्ट में थे, लेकिन बाद में ‘सीता के पति’ और हिंदू धर्म के खिलाफ बातें हुईं, जो ठीक नहीं हैं।” इस तरह यात्रा में भाग लेने वाले युवाओं की सोच और उनके विचार भी अलग-अलग हैं।
परंपरागत कांवड़ से आधुनिक कलश कांवड़ का ट्रेंड
शिविर में मुलाकात हुई करीब 40 साल के कार्तिक से, जिन्होंने बताया कि उनके समय की कांवड़ अब पुरानी हो चुकी है। नई पीढ़ी ने इसे अपने हिसाब से अपडेट कर लिया है। अब ट्रेंड में है- बड़े-बड़े कलश वाली कांवड़, जिनमें ज्यादा जल भरा जाता है और अपनी कांवड़ को अलग दिखाने की होड़ लगी है।
लेकिन इस होड़ के बीच एक चिंता भी है। कार्तिक कहते हैं, “लोग ज्यादा से ज्यादा जल भरकर ले आते हैं, लेकिन जब हिम्मत जवाब देने लगती है, तो रास्ते में ही कांवड़ छोड़कर भाग जाते हैं।” युवाओं में सबसे ज्यादा पसंदीदा है- कलश कांवड़। कई जगह सड़क किनारे और झाड़ियों के बीच ये कांवड़ें पड़ी मिलती हैं, और मुजफ्फरनगर जैसे इलाकों में तो कई दिनों से कोई इन्हें लेने नहीं आया।”
बातचीत के दौरान पता चला कि कई कांवड़िए ‘भोले के चोर’ बन जाते हैं, यानी रास्ते में बाइक या ई-रिक्शा से लिफ्ट लेकर सफर का बड़ा हिस्सा पूरा कर लेते हैं। वहीं, कुछ कांवड़िए यूपी चुनाव की स्थिति को लेकर भी चर्चा कर रहे थे, जिनमें से एक ने कहा, “इस बार चुनाव जीतना मुश्किल है, क्योंकि व्यवस्था कमजोर है।” यह बातें यात्रा की वर्तमान स्थिति और चुनौतियों को दर्शाती हैं।











