बुजुर्गों की दर्दभरी कहानी: परिवार से दूर वृद्धाश्रम की जिंदगी
नीलम का जीवन एक आम बुजुर्ग की तरह शुरू हुआ, लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें वृद्धाश्रम का रास्ता दिखाया। जम्मू-कश्मीर (Jammu and Kashmir) की रहने वाली नीलम का कहना है कि उनके पति करीब आठ-नौ साल पहले लकवे से पीड़ित हो गए थे, जिसके बाद से उनकी देखभाल का जिम्मा उनके ही कंधों पर आ गया। उनके तीन बेटियां और एक बेटा हैं, और बेटा अक्सर उन्हें फोन करता है या मिलने आता है।
हालांकि, घर लौटने का मन नीलम का नहीं है। उनके मन में डर है कि कहीं फिर से झगड़ा न हो जाए। इसीलिए, अपने पति की देखभाल और अपनी सुरक्षा के लिए वह वृद्धाश्रम में रहने का फैसला करती हैं। नीलम का कहना है कि उनके पति अभी भी उनके साथ हैं, और वह खुद भी आश्रम में भगवान का धन्यवाद करती हैं कि उन्हें यहां रखा गया है।
परिवार से दूरी क्यों बनी, यह है मुख्य कारण
नीलम बताती हैं कि उनके बेटे का कहना है कि वे घर आकर बात करेंगे, लेकिन वह अभी तैयार नहीं हैं। उनका डर है कि यदि वापस गए और फिर विवाद हुआ, तो स्थिति और बिगड़ सकती है। इसीलिए, वह फिलहाल वृद्धाश्रम में ही रहना बेहतर समझती हैं। उनके साथ उनके पति भी हैं, जो लंबे समय से बीमार हैं और चलने-फिरने में असमर्थ हैं। नीलम ही उनकी देखभाल करती हैं, और आश्रम में उनका जीवन आरामदायक है।
वृद्धाश्रम की वास्तविकता और बुजुर्गों का दर्द
नीलम का मूल निवास जम्मू-कश्मीर (Jammu and Kashmir) है, लेकिन अब उनका जीवन सोनीपत (Sonipat) के वृद्धाश्रम में गुजर रहा है। यह दूरी सिर्फ भौगोलिक नहीं है, बल्कि उनके अपने परिवार से भी है। उनके पास शिकायतें हैं, लेकिन साथ ही बच्चों के प्रति प्रेम भी है। बेटा बुलाता है, तो मन डगमगाता है, पर फिर वही पुराना डर सताने लगता है कि कहीं फिर से झगड़ा न हो जाए। इसी डर के कारण वह घर लौटने से बचती हैं।
वृद्धाश्रम में नीलम जैसी कई बुजुर्ग महिलाएं और पुरुष रहते हैं, जिनके साथ उनके अपने परिवार का रिश्ता टूट चुका है। आश्रम के संचालक आनंद सिंह का कहना है कि यदि परिवार बुजुर्गों का सही तरीके से ख्याल रखता, तो वे यहां क्यों आते? अधिकतर बुजुर्ग पारिवारिक विवाद, मौत या अलगाव के कारण इस जगह पहुंचते हैं।
उदाहरण के तौर पर, सोनीपत के इस वृद्धाश्रम में शिवचरण की मौत हुई, जिनकी तीन बेटियां थीं, लेकिन अंतिम समय में भी वे उनके पास नहीं आईं। शिवचरण अपनी बेटियों से बहुत प्यार करते थे, और उम्मीद थी कि वे उनका सहारा बनेंगी। लेकिन जब वह अंतिम पड़ाव पर पहुंचे, तो बेटियों ने उनके अंतिम संस्कार में भी भाग नहीं लिया।
यहां रहने वाले हर बुजुर्ग की कहानी अलग है, लेकिन दर्द का स्वर समान है। कोई अपने बेटों से दूर है, तो कोई बहू से विवाद के कारण घर छोड़ने को मजबूर है। कुछ के पास लाखों की जमा पूंजी है, फिर भी परिवार का साथ नहीं है। आश्रम में रह रहे बुजुर्गों को सबसे ज्यादा कमी अपने परिवार का साथ ही महसूस होता है।









