डिजिटल सबूतों के आधार पर हाई कोर्ट का अहम फैसला
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट (High Court of Madhya Pradesh) की इंदौर बेंच ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है जिसमें डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को न्यायिक प्रक्रिया में मान्यता दी गई है। अदालत ने एक आत्महत्या के मामले में मृतक के मोबाइल से प्राप्त वॉट्सएप (WhatsApp) संदेशों को ‘मृत्यु-पूर्व बयान’ (Dying Declaration) माना है। इस फैसले के आधार पर तीनों आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी गई हैं।
मामले का संक्षिप्त विवरण और कोर्ट का निर्णय
जस्टिस जय कुमार पिल्लई की अध्यक्षता वाली हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने 27 जुलाई को धार जिले के विशेष जज (अत्याचार निवारण अधिनियम) के आदेश को बरकरार रखा, जिसमें आरोपियों की जमानत याचिकाएं अस्वीकृत की गई थीं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपी पक्ष की अपील भी खारिज कर दी गई है।
क्या है पूरा मामला और कोर्ट का तर्क
यह मामला संतोष, उर्फ लखन औसारी की आत्महत्या से जुड़ा है, जिसने कृषि भूमि विवाद के कारण अपने जीवन का अंत कर लिया था। जांच में पता चला कि 7 मई को अपनी मौत से पहले, औसारी ने अपने पिता को वॉट्सएप (WhatsApp) के माध्यम से संदेश भेजे थे। कोर्ट ने इन संदेशों को महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य माना है, जो मृतक के मृत्यु-पूर्व बयान के रूप में काम करते हैं।
अदालत ने कहा कि मृतक के मोबाइल से प्राप्त तीन वॉट्सएप संदेश उसकी मौत से पहले भेजे गए थे, जो आरोपियों का नाम स्पष्ट रूप से लेते हैं। इन संदेशों और मृतक के परिवार के सदस्यों के बयान से पता चलता है कि आरोपियों ने लगातार धमकियां दीं, गाली-गलौज की और जान से मारने की धमकियां भी दीं, जिसके कारण मृतक ने आत्महत्या की।
अभियोजन पक्ष ने इन इलेक्ट्रॉनिक सबूतों का हवाला देते हुए आरोपियों की जमानत याचिकाओं का विरोध किया। वहीं, आरोपियों के वकील ने तर्क दिया कि उनका मुवक्किल औसारी की आत्महत्या से कोई संबंध नहीं रखता और मामले को पुरानी दुश्मनी का परिणाम बताया। लेकिन कोर्ट ने इन तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि मृतक ने अपने संदेशों में आरोपियों का नाम लिया है और परिवार के सदस्यों के बयान भी लगातार प्रताड़ना की पुष्टि करते हैं।
अंत में, कोर्ट ने यह भी माना कि इन सबूतों के आधार पर आरोपियों को जमानत देना उचित नहीं है, क्योंकि अभी तक की जांच और सबूत इस दिशा में पर्याप्त भरोसेमंद हैं। इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक सबूत न्यायिक प्रक्रिया में कितने महत्वपूर्ण हो सकते हैं।











