सिर्फ 500 रुपये की घड़ी को लेकर हुआ हिंसक झगड़ा
एक मामूली विवाद, जिसमें केवल 500 रुपये की एक घड़ी का लेनदेन था, अचानक हिंसक संघर्ष में बदल गया और एक व्यक्ति की जान चली गई। यह मामला लगभग 29 वर्षों तक अदालतों में लंबित रहा। अंततः सुप्रीम कोर्ट ने इस पुराने आपराधिक मामले का निपटारा करते हुए जीवित दोषी को राहत दी है। अदालत ने दोषसिद्धि को कायम रखा, लेकिन पांच साल की कठोर सजा को पहले ही काटी गई अवधि के अनुसार सीमित कर दिया।
मामले का संक्षिप्त इतिहास और न्यायिक निर्णय
यह मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 304 के तहत दर्ज हुआ था। सुप्रीम कोर्ट की पीठ में न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति अरुण पल्ली ने फैसला सुनाते हुए कहा कि घटना 12 फरवरी 1997 की है। उस समय आरोपी माथू की उम्र 33 वर्ष थी, जो अब 60 से अधिक हो चुकी है। रिकॉर्ड से पता चलता है कि विवाद अचानक शुरू हुआ और मारपीट के दौरान पदम सिंह सूखी नहर में गिर गए। चोटें, जो उनके सिर और चेहरे पर मिलीं, वे गिरने के कारण भी हो सकती हैं।
कानूनी प्रक्रिया और राहत का आधार
देहरादून की ट्रायल कोर्ट ने 2002 में तीनों आरोपियों को हत्या के प्रयास का दोषी माना और उन्हें पांच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। बाद में 2012 में उत्तराखंड हाई कोर्ट ने इस फैसले को बरकरार रखा। इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। न्यायालय ने माना कि आरोपी पहले ही करीब डेढ़ साल जेल में बिताकर बाहर आ चुके हैं। साथ ही, यह भी देखा गया कि मृतक की चोटें गिरने के कारण भी हो सकती हैं। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी की पांच साल की सजा को पहले ही काटी गई अवधि तक सीमित किया जाना उचित है। इस निर्णय के साथ ही लगभग तीन दशक पुराने इस मामले का कानूनी अंत हो गया है।










