कूनो नेशनल पार्क में प्रोजेक्ट चीता का प्रभाव स्पष्ट दिखाई दे रहा है
मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में स्थित कूनो नेशनल पार्क में ‘प्रोजेक्ट चीता’ का प्रभाव अब पूरे जंगल क्षेत्र में साफ-साफ नजर आ रहा है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना का उद्देश्य केवल चीते ही नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को पुनः जीवंत बनाना था। आज इस प्रयास के परिणाम आश्चर्यजनक रूप से सकारात्मक दिखाई दे रहे हैं। हाल ही में किए गए कैमरा ट्रैप सर्वे में कूनो के जंगलों में अत्यंत दुर्लभ माने जाने वाले वन्य जीव स्याहगोश या जंगली बिल्ली (Caracal) की उपस्थिति दर्ज की गई है। यह पहली बार है जब दशकों बाद इस जीव की तस्वीरें कैमरे में कैद हुई हैं, जो इसके पुनः लौटने का मजबूत संकेत हैं।
कूनो में जंगली जीवों की नई उपस्थिति और बदलाव
कूनो के जंगलों में पहली बार दर्ज हुए इन बड़े बदलावों में जंगली उल्लू का भी उल्लेखनीय स्थान है। दिसंबर 2025 से इस दुर्लभ उल्लू को कूनो के जंगलों में नियमित रूप से देखा जा रहा है। यह उल्लू लगभग 113 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद पहली बार यहां दिखाई दिया है। इसके अलावा, कूनो की पारोंद बीट में विलुप्तप्राय शिकारी पक्षी भी नजर आया है।
इसके साथ ही, कूनो के इतिहास में पहली बार जंगली कुत्तों (ढोल) की मौजूदगी भी पाई गई है, जिसे विशेषज्ञ इस क्षेत्र की बेहतर हो रही पारिस्थितिकी का संकेत मान रहे हैं। इन बदलावों से यह साबित होता है कि कूनो का पर्यावरण धीरे-धीरे स्वस्थ हो रहा है।
पारिस्थितिकी में सुधार और वन्यजीवों का पुनः आगमन
कूनो में पहली बार जंगली ढोल और भारतीय भेड़ियों की उपस्थिति ने इस क्षेत्र की जैव विविधता में सुधार का संकेत दिया है। पहले गर्मियों में पानी और भोजन की कमी के कारण भेड़िए और अन्य वन्यजीव पलायन कर जाते थे, लेकिन अब बेहतर जल प्रबंधन के चलते ये स्थायी रूप से यहां रहने लगे हैं।
वन विभाग ने आधुनिक जल प्रबंधन तकनीकों का सहारा लेकर कूनो नदी का पानी जंगल के ऊंचे और पथरीले इलाकों तक पहुंचाया है। सोलर पंप जैसी नई तकनीकों का उपयोग कर गर्मियों में भी तालाबों में पानी की आपूर्ति सुनिश्चित की गई है। इस प्रयास से अब कूनो का वातावरण पूरी तरह बदल चुका है।
आज कूनो का दृश्य पहले से कहीं अधिक शांत और प्राकृतिक हो गया है। पक्षियों की मधुर चहचहाहट और वन्यजीवों की गूंजती आवाजें इस क्षेत्र की जीवंतता को दर्शाती हैं। शाम के समय जब जंगल में हल्की धूल और गर्मी का असर कम हो जाता है, तो यहां के जानवर पानी की तलाश में अपने स्थायी घर की ओर लौटते हैं।











