दिल्ली में फिर से सीलिंग का खतरा मंडराने लगा
राजधानी दिल्ली के बाजारों पर एक बार फिर सीलिंग का खतरा बढ़ता नजर आ रहा है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दिल्ली नगर निगम (MCD) ने शहर के विभिन्न बाजारों और आवासीय इलाकों में चल रही व्यावसायिक गतिविधियों का सर्वेक्षण शुरू करने का निर्देश दिया है। इस सर्वे का उद्देश्य 20 मई तक अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत करना है।
इस आदेश के बाद दिल्ली के लाखों व्यापारियों में चिंता और अनिश्चितता का माहौल बन गया है। विशेष रूप से उन बाजारों में अधिक डर देखा जा रहा है, जो मूल रूप से रिहायशी क्षेत्रों में विकसित हुए थे, लेकिन समय के साथ बड़े व्यावसायिक केंद्र बन गए हैं। व्यापारियों को आशंका है कि यदि इन क्षेत्रों को वैध रूप से कमर्शियल घोषित नहीं किया गया, तो बड़े पैमाने पर सीलिंग अभियान चलाया जा सकता है। दिल्ली के चांदनी चौक, सदर बाजार, करोल बाग, कीर्ति नगर, अमर कॉलोनी, लाजपत नगर, गांधी नगर, कृष्णा नगर और राजौरी गार्डन जैसे प्रमुख बाजारों के साथ ही सैकड़ों छोटे बाजार भी इस कार्रवाई के दायरे में आ सकते हैं। इनमें लाखों दुकानदार और कारोबारी अपनी आजीविका चला रहे हैं।
व्यापारियों और रेजिडेंट्स के बीच बढ़ती टकराव की आशंका
दिल्ली व्यापार महासंघ के अध्यक्ष देवराज बवेजा का कहना है कि हाल ही में व्यापारियों के प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता से मुलाकात की थी। इस दौरान उन्होंने मांग की कि दिल्ली मास्टर प्लान 2021 के तहत उन 2183 सड़कों का सर्वे किया जाए, जहां 70 प्रतिशत से अधिक व्यावसायिक गतिविधियां हो रही हैं। यदि इन सड़कों को आधिकारिक रूप से कमर्शियल घोषित कर दिया जाता है, तो लाखों व्यापारियों को सीलिंग की कार्रवाई से राहत मिल सकती है।
बवेजा ने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री ने व्यापारियों को आश्वासन दिया है कि दिल्ली में कोई भी सीलिंग नहीं होगी। उनका तर्क है कि कई बाजार दशकों पुराने हैं और समय के साथ उनकी पहचान पूरी तरह व्यावसायिक हो चुकी है, लेकिन तकनीकी कारणों से अभी भी उन्हें रिहायशी क्षेत्र माना जाता है, जिससे बार-बार सीलिंग का खतरा बना रहता है।
वहीं दूसरी ओर रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) ने रिहायशी इलाकों में बढ़ती व्यावसायिक गतिविधियों पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। मॉडल टाउन RWA के अध्यक्ष संजय गुप्ता का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार रिहायशी इलाकों का सर्वे जरूरी है। उन्होंने बताया कि दिल्ली की कॉलोनियों में व्यावसायिक गतिविधियों का बढ़ना जीवन को कठिन बना रहा है, जिससे ट्रैफिक जाम, पार्किंग की समस्या, प्रदूषण और भीड़भाड़ जैसी परेशानियां बढ़ गई हैं।
मिश्रित भूमि उपयोग और सरकार की भूमिका
संजय गुप्ता ने आरोप लगाया कि बिल्डर माफिया और अधिकारियों के गठजोड़ के कारण दिल्ली में अनियोजित तरीके से मिक्स्ड लैंड यूज को बढ़ावा मिला है। उनका कहना है कि सरकार और एमसीडी को तय करना चाहिए कि अधिक महत्वपूर्ण क्या है—राजस्व बढ़ाना या दिल्ली को रहने लायक बनाना।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि दिल्ली की वॉल्ड सिटी और वॉल्ड सिटी एक्सटेंशन के अधिकांश बाजार पहले से ही मास्टर प्लान 2021 में कमर्शियल घोषित हैं, इसलिए इन क्षेत्रों के व्यापारियों को घबराने की जरूरत नहीं है।
दिल्ली में सीलिंग का मुद्दा पहले भी कई बार उठा है, और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद कई बाजारों में अभियान चलाए गए हैं, जिससे व्यापारियों को भारी आर्थिक नुकसान हुआ है। अब फिर से एमसीडी के सर्वे और संभावित कार्रवाई ने बाजारों में बेचैनी बढ़ा दी है। व्यापारियों का मानना है कि दशकों से चल रहे कारोबार को अचानक अवैध घोषित करना उचित नहीं है, जबकि रेजिडेंट्स का तर्क है कि अनियंत्रित व्यावसायिक गतिविधियों ने कॉलोनियों की मूल पहचान और जीवन स्तर को प्रभावित किया है।
आने वाले दिनों में दिल्ली सरकार, एमसीडी और सुप्रीम कोर्ट के रुख पर सभी की नजरें टिकी होंगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार व्यापारियों को राहत देने के लिए कोई नई नीति बनाती है या फिर फिर से बड़े स्तर पर सीलिंग अभियान शुरू किया जाता है।











