बिहार में पहली बार बीजेपी का मुख्यमंत्री पद पर कब्जा
बिहार की राजनीतिक परिदृश्य में पहली बार भारतीय जनता पार्टी (BJP) का नेता मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रहा है। यह ऐतिहासिक अवसर बीजेपी के लिए वर्षों की प्रतीक्षा का परिणाम है, जिसने कई बार सरकार में भागीदारी निभाई, लेकिन मुख्यमंत्री पद तक पहुंचने का मौका नहीं मिला। नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद, एनडीए (NDIA) विधायक दल के नेता के रूप में सम्राट चौधरी का चयन किया गया है, और बुधवार को वह मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण करेंगे।
सम्राट चौधरी का राजनीतिक सफर और भाजपा में उभार
सम्राट चौधरी का राजनीतिक जीवन बिना किसी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) या भाजपा की पारंपरिक पृष्ठभूमि के शुरू हुआ। उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत लालू प्रसाद यादव की आरजेडी (RJD) से की थी और जेडीयू (JDU) के साथ जुड़े रहे। लगभग आठ साल पहले उन्होंने भाजपा में शामिल होकर अपनी स्थिति मजबूत की। आरजेडी और जेडीयू में रहते हुए भी, उन्होंने विधायक और मंत्री पद प्राप्त किए, लेकिन असली सफलता भाजपा में मिली। तेजी से उभरते हुए, उन्होंने अपने समर्थकों और पार्टी नेताओं को पीछे छोड़ते हुए बिहार की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई।
बिहार की राजनीति में सम्राट चौधरी का उदय और भाजपा में भूमिका
सम्राट चौधरी का जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि बिहार की ओबीसी (OBC) राजनीति से जुड़ी है। उनके पिता शकुनी चौधरी भी बिहार की सियासत में एक प्रभावशाली नेता रहे हैं। अपने पिता की विरासत को संभालते हुए, सम्राट ने 1999 में आरजेडी के साथ अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की और रबड़ी देवी की सरकार में मंत्री बने। युवावस्था में ही उन्होंने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया, जब वे केवल 25 वर्ष की उम्र में युवा मंत्री बन गए। बाद में जेडीयू में शामिल होकर मंत्री पद संभाला, लेकिन नीतीश कुमार के साथ मतभेद के कारण उन्होंने पार्टी छोड़ दी और भाजपा का दामन थाम लिया। भाजपा में शामिल होने के बाद, उन्होंने अपने राजनीतिक कौशल का प्रदर्शन किया और 2019 में पार्टी के उपाध्यक्ष पद तक पहुंचे।










