सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू कामगारों के न्यूनतम वेतन पर दी स्पष्टता
सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम वेतन निर्धारण की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया कि यह मुद्दा केवल अधिकारों का नहीं, बल्कि इसके सामाजिक और आर्थिक प्रभावों का भी है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि इस मामले में कोर्ट को यह भी विचार करना चाहिए कि ऐसे आदेशों के क्या परिणाम हो सकते हैं।
सामाजिक सुरक्षा और शोषण के खतरे पर चिंता
सीजेआई ने कहा कि घरेलू कामगारों के अधिकारों का उल्लंघन करने का तर्क देना आसान है, लेकिन हमें इसके दीर्घकालिक प्रभावों पर भी ध्यान देना चाहिए। उन्होंने आशंका जताई कि यदि न्यूनतम वेतन तय किया गया, तो कई लोग घरेलू कामगार रखना ही बंद कर देंगे, जिससे सबसे अधिक नुकसान उन कामगारों को होगा।
एजेंसियों के माध्यम से शोषण का मुद्दा और कोर्ट का रुख
सीजेआई ने अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए बताया कि बड़े शहरों में घरेलू कामगारों को सीधे नहीं, बल्कि सर्विस प्रोवाइडर एजेंसियों के माध्यम से रखा जाता है। उन्होंने कहा, “मैंने देखा है कि ये एजेंसियां किस तरह शोषण करती हैं। एक बार सुप्रीम कोर्ट ने भी एक एजेंसी के जरिए एक श्रेणी के कर्मचारियों को रखा था, जिसमें 54 हजार रुपये लिए गए और गरीब लड़की को केवल 19 हजार रुपये दिए गए।” उन्होंने यह भी कहा कि घरेलू कामगारों को सीधे रखने से सुरक्षा और भरोसे का रिश्ता बनता है, जबकि एजेंसियों के जरिए रखे गए कामगार पूरी तरह शोषण के शिकार होते हैं।









