यूरोपीय संघ का रूस पर प्रतिबंध और भारत पर प्रभाव
यूरोपीय संघ ने रूस के खिलाफ कड़े कदम उठाते हुए कई प्रतिबंध लगाए हैं, जिनका असर भारत सहित अन्य देशों पर भी दिखाई दे रहा है। इस समय जब भारत और यूरोप के बीच मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) की बातचीत अंतिम चरण में है, तब यूरोपीय संघ ने रूस से जुड़ी 45 संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया है। इनमें से 12 चीनी, तीन भारतीय और दो थाईलैंड की कंपनियां भी शामिल हैं। साथ ही, यूरोपीय संघ ने रूसी राजनयिकों की आवाजाही पर भी रोक लगा दी है। इन प्रतिबंधों का परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम दो डॉलर बढ़कर 64 डॉलर प्रति बैरल हो गए हैं। इस बीच, अमेरिका ने रूस की दो प्रमुख तेल कंपनियों पर नए प्रतिबंध लगाए हैं, जिससे भारत की तेल खरीद पर असर पड़ने की आशंका है।
भारत की तेल खरीद और रूस की कंपनियों पर प्रतिबंध का असर
रूस की सबसे बड़ी ऊर्जा कंपनी रोसनेफ्ट से भारत की रिलायंस इंडस्ट्रीज रोजाना लगभग 5 लाख बैरल कच्चा तेल आयात करती है, जो देश के कुल आयात का लगभग आधा हिस्सा है। रिलायंस का यह समझौता रूस की इस प्रमुख कंपनी के साथ 25 वर्षों का है। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण, भारत की तेल खरीद रणनीति पर असर पड़ने की संभावना है, क्योंकि रिलायंस अपने आयात को नई सरकारी गाइडलाइनों के अनुसार समायोजित कर रही है। वहीं, चीन ने इन अमेरिकी प्रतिबंधों का विरोध करते हुए कहा है कि इनका कोई अंतरराष्ट्रीय कानूनी आधार नहीं है।
रूस का जवाब और अंतरराष्ट्रीय स्थिति
रूस ने इन प्रतिबंधों के जवाब में कहा है कि अमेरिका उनका मुख्य दुश्मन है। पूर्व राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने कहा कि अमेरिका जंग का रास्ता अपना चुका है और रूस को हर हाल में जीत हासिल होगी। रूस का मानना है कि अमेरिका ने युद्ध का रास्ता चुना है और वह किसी भी कीमत पर पीछे नहीं हटेगा। इस स्थिति में भारत और अन्य देशों के लिए रूस से तेल खरीदने की रणनीति और वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता बनाए रखना एक चुनौती बन गई है।











