लखनऊ को यूनेस्को की ‘क्रिएटिव सिटी ऑफ गैस्ट्रोनॉमी’ का सम्मान
विश्व स्तर पर अवध की पाक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को मान्यता देते हुए यूनेस्को ने लखनऊ को ‘क्रिएटिव सिटी ऑफ गैस्ट्रोनॉमी’ घोषित किया है। यह प्रतिष्ठित सम्मान लखनऊ की विशिष्ट नवाबी रसोई, पारंपरिक व्यंजनों और साझा संस्कृति का प्रतीक है। अब यह शहर वैश्विक खाद्य हब्स की सूची में शामिल हो गया है, जिससे उत्तर प्रदेश के पर्यटन और रोजगार के क्षेत्र में नई संभावनाएं खुलेंगी।
प्रधानमंत्री और राज्य सरकार का उत्साहजनक संदेश
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस उपलब्धि पर लखनऊ और उसके निवासियों को बधाई देते हुए कहा कि यह सम्मान उत्तर प्रदेश के ‘विकसित उत्तर प्रदेश’ के विजन को मजबूत करेगा। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर लिखा, “लखनऊ की जीवंत संस्कृति उसकी खानपान परंपरा में बसती है। मुझे खुशी है कि यूनेस्को ने इस पहलू को पहचाना। मैं विश्व के लोगों से आग्रह करता हूं कि वे लखनऊ आएं और इसकी अनोखी विरासत का अनुभव करें।” इस सफलता से न केवल शहर की पहचान बढ़ेगी, बल्कि इसकी सांस्कृतिक धरोहर भी विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त करेगी।
खानपान और सांस्कृतिक कूटनीति का माध्यम
उत्तर प्रदेश के पर्यटन सचिव अमृत अभिजात ने कहा कि लखनऊ की थालियों में सिर्फ स्वाद ही नहीं, बल्कि एक समृद्ध कहानी भी छुपी है। नवाबी रसोई से लेकर सड़क किनारे के ठेलों तक, हर व्यंजन लखनऊ की संस्कृति, मेहनत और सौहार्द्र का परिचायक है। इस सम्मान से शहर की फूड उद्यमिता और सतत पर्यटन को नई दिशा मिलेगी। 2024 में लखनऊ ने लगभग 82.7 लाख पर्यटकों का स्वागत किया था, और पहले छह महीनों में ही 70 लाख से अधिक सैलानी यहां आ चुके हैं। यह संख्या दर्शाती है कि अब लखनऊ की खुशबू न केवल भारत में बल्कि विश्वभर में फैल रही है।
यूनेस्को का यह सम्मान कैसे मिला?
यह उपलब्धि एक साल से अधिक की मेहनत का परिणाम है। उत्तर प्रदेश पर्यटन निदेशालय ने लखनऊ की खानपान परंपरा, स्थानीय समुदाय की भागीदारी और पाक इतिहास पर आधारित विस्तृत दस्तावेज (डॉसियर) तैयार किया। इस दस्तावेज को 31 जनवरी 2025 को भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय को भेजा गया, जिसने इसे 3 मार्च 2025 को आधिकारिक रूप से यूनेस्को को प्रस्तुत किया। अंततः 31 अक्टूबर को लखनऊ को आधिकारिक रूप से ‘क्रिएटिव सिटी ऑफ गैस्ट्रोनॉमी’ घोषित किया गया।
अवधी रसोई का सांस्कृतिक महत्व
इस डॉसियर के शोध कार्य का नेतृत्व प्रसिद्ध हेरिटेज आर्किटेक्ट आभा नारायण लांबा ने किया। उनकी टीम ने नवाबी दौर के शाही रसोईघरों से लेकर आधुनिक सड़क ठेलों तक, हर स्वाद और परंपरा का दस्तावेजीकरण किया। रिपोर्ट में गलौटी कबाब, अवधी बिरयानी, टोकरी चाट, पुरी-कचौरी और मिठाइयों जैसे मलाई गिलोरी, मक्खन मलाई और मोतीचूर लड्डू को सिर्फ पकवान नहीं, बल्कि सांस्कृतिक कहानियों के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
लखनऊ अब विश्व स्तर पर एक फूड हब
इस उपलब्धि के साथ ही लखनऊ ने खुद को यूनेस्को की 70 गैस्ट्रोनॉमी सिटीज की सूची में शामिल कर लिया है। अब इसका नाम हैदराबाद, केलोना (कनाडा), क्वांझोउ (चीन) और ज़रागोज़ा (स्पेन) जैसे वैश्विक खाद्य केंद्रों के साथ लिया जाएगा। यह सम्मान न केवल लखनऊ की वैश्विक पहचान को मजबूत करेगा, बल्कि स्थानीय कारीगरों, रसोइयों और छोटे व्यवसायों के लिए नई रोजगार संभावनाएं भी खोल देगा।
खुशबू जो दिलों को जोड़ती है
यह सम्मान यह संदेश भी देता है कि भोजन केवल स्वाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, विरासत और एकता का प्रतीक है। लखनऊ का यह गौरव न केवल अवध की मिट्टी की खुशबू है, बल्कि भारत की विविधता, मेहमाननवाज़ी और कला की भी पहचान है। इस तरह, यह सम्मान न केवल एक उपलब्धि है, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक धरोहर की विश्वसनीयता का प्रतीक भी है।











