अयोध्या में दीपोत्सव का भव्य आयोजन और उसकी झलक
रविवार को अयोध्या में दीपोत्सव का आयोजन अत्यंत धूमधाम और उत्साह के साथ संपन्न हुआ। इस पावन अवसर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राम-जानकी रथ यात्रा का शुभारंभ किया और राम की पैड़ी पर सरयू नदी की महाआरती में भाग लिया। इस दौरान सरयू तट पर बने 56 घाटों को 26 लाख से अधिक दीयों की रोशनी से जगमगा दिया गया, जिससे पूरा क्षेत्र दिव्य प्रकाश से भर गया। यह आयोजन न केवल धार्मिक बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण था, जिसने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया।
दीपोत्सव में नए विश्व रिकॉर्ड और इसकी विशेषताएं
अयोध्या का यह दीपोत्सव अपने आप में एक ऐतिहासिक घटना रहा, जिसमें 26 लाख 17 हजार 253 दीयों को प्रज्ज्वलित कर विश्व का नया रिकॉर्ड बनाया गया। इस आयोजन ने न केवल भारत में बल्कि विश्व स्तर पर भी अपनी अलग पहचान बनाई। पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ते हुए इस वर्ष का दीपोत्सव सबसे भव्य और आकर्षक रहा, और इसने दो नए गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड भी स्थापित किए। इस आयोजन में 2128 अर्चकों ने सरयू नदी की आरती की, जिससे इसकी भव्यता और धार्मिक महत्व और भी बढ़ गया।
राजनीतिक हलचल और आयोजन में उपमुख्यमंत्रियों की अनुपस्थिति
इस भव्य दीपोत्सव के दौरान उत्तर प्रदेश के दोनों उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक का अचानक अपने अयोध्या दौरे को रद्द कर देना चर्चा का विषय बन गया। केशव मौर्य ने सुबह ही अपने दौरे का कार्यक्रम जारी किया था, लेकिन शाम तक ‘अपरिहार्य कारणों’ का हवाला देते हुए उन्होंने अपने दौरे को स्थगित कर दिया। वहीं, ब्रजेश पाठक ने भी लखनऊ में रहते हुए अपने अयोध्या जाने का प्लान रद्द कर दिया।
विज्ञापन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तस्वीरें प्रमुखता से दिखाई गईं, लेकिन दोनों डिप्टी सीएम का नाम और फोटो गायब थे। इसके अलावा, यूपी के कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही और पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह का नाम तो विज्ञापन में था, लेकिन दोनों उपमुख्यमंत्री की उपस्थिति का कोई उल्लेख नहीं था। राज्यपाल आनंदीबेन पटेल का नाम भी था, लेकिन उनकी तस्वीर नहीं थी, और उन्होंने भी स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर कार्यक्रम में भाग नहीं लिया। यह पहली बार है जब इस तरह के प्रमुख आयोजन में दोनों उपमुख्यमंत्री और राज्यपाल की अनुपस्थिति देखी गई।
राजनीतिक विवाद और गुटबाजी का संकेत
इस आयोजन को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह सरकारी विज्ञापन का निर्णय केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि भाजपा के अंदर गुटबाजी का संकेत भी हो सकता है। विपक्ष ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर तंज कसते हुए पूछा, ‘क्या यूपी की भाजपा सरकार में उप-मुख्यमंत्री के दोनों पद समाप्त कर दिए गए हैं? विज्ञापन में कनिष्ठ मंत्रियों के नाम तो दिख रहे हैं, लेकिन डिप्टी सीएम का नाम और तस्वीर क्यों नहीं है? कहीं यह भी प्रभुत्ववादी सोच का परिणाम तो नहीं?’ इस तरह की चर्चाएं इस बात को दर्शाती हैं कि राजनीतिक स्तर पर इस आयोजन का प्रभाव और विवाद दोनों ही बढ़ रहे हैं।











