पौष मास की संकष्टी चतुर्थी का महत्व और व्रत कथा
हर साल पौष माह की चतुर्थी तिथि पर संकष्टी चतुर्थी का त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है, जिसमें भगवान गणेश जी की पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन भक्त पूरे श्रद्धा और नियमों का पालन करते हुए व्रत रखते हैं और भगवान गणेश की कथा का पाठ करते हैं। माना जाता है कि इस व्रत और पूजा से जीवन में आने वाली सभी बाधाएँ, दुख-दर्द और परेशानियाँ दूर हो जाती हैं। यह त्योहार विशेष रूप से भक्तों के जीवन में सुख, समृद्धि और शांति लाने का प्रतीक है।
प्राचीन कथा और भगवान गणेश की पूजा का महत्व
प्राचीन कथाओं के अनुसार, महादेव के परम भक्त और महाबलशाली रावण ने सभी देवताओं को परास्त कर स्वर्ग पर अपना अधिकार जमा लिया था। उसकी अहंकार की सीमा नहीं थी। एक दिन जब किष्किंधा के राजा महाबलि बली संध्या अर्पित कर रहे थे, तभी रावण ने पीछे से उन्हें पकड़ लिया। हालांकि, महाबलि की शक्ति का रावण को अंदाजा नहीं था। महाबलि ने रावण को पकड़कर अपने पास दबोच लिया, और रावण अपनी शक्ति का प्रयोग करने में असमर्थ रहा।
इसके बाद बली ने रावण को अपने नगर किष्किंधा ले जाकर अपने पुत्र अंगद को खिलौने की तरह खेलने का अवसर दिया। अंगद ने रावण को रस्सी से बांधकर घुमाया, जिससे रावण को अत्यंत पीड़ा और दुख हुआ। जब यह सहन नहीं हुआ, तो रावण ने अपने पितामह महर्षि पुलस्त्य जी को बुलाया। महर्षि पुलस्त्य ने रावण की समस्या सुनी और उन्हें पौष संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत करने की सलाह दी।
रावण का संकट दूर करने में गणेश जी का व्रत और कथा
महर्षि पुलस्त्य जी ने रावण को बताया कि जो भी भक्त सच्चे मन से पौष मास की चतुर्थी को भगवान गणेश जी की पूजा और व्रत करता है, उसके सभी संकट और दुख दूर हो जाते हैं। रावण ने इस बात को मानकर पूरे श्रद्धा के साथ संकष्टी चतुर्थी का व्रत और पूजा की। परिणामस्वरूप, रावण महाबलि बली के बंधनों से मुक्त हो गया और उसे अपना राज्य पुनः प्राप्त हो गया।










