दिवाली का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व
दिवाली, जिसे प्रकाश का त्योहार भी कहा जाता है, भारत में हर साल बड़े उत्साह और धूमधाम के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार मुख्य रूप से कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है, जिसमें घरों को दीपकों से सजाया जाता है और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। माना जाता है कि इस दिन दीपक जलाने से घर में सुख-समृद्धि और खुशियां आती हैं। भारत के विभिन्न राज्यों में इस पर्व की परंपराएं अलग-अलग हैं, जैसे काली पूजा का आयोजन भी इस अवसर पर किया जाता है। इस त्योहार का इतिहास बहुत पुराना है, जो धार्मिक मान्यताओं और कहानियों से जुड़ा हुआ है।
दिवाली की शुरुआत का पौराणिक इतिहास
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सतयुग में देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था। इस दौरान कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को भगवान धन्वंतरि अमृत का कलश लेकर प्रकट हुए थे। इसके दो दिन बाद माता लक्ष्मी कमल पर विराजमान होकर प्रकट हुईं। तभी से इस तिथि को माता लक्ष्मी के प्राकट्य का उत्सव माना जाता है, और हर साल दीपक जलाकर उनकी पूजा की जाती है। यह परंपरा दिवाली के रूप में विकसित हुई, जो आज भी पूरे भारत में मनाई जाती है।
रामायण से जुड़ी दिवाली की परंपरा
वाल्मीकि रामायण के अनुसार, त्रेतायुग में भगवान राम 14 वर्षों के वनवास के बाद माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे थे। उनके आगमन की खुशी में अयोध्यावासियों ने पूरे नगर को सजाया और दीपक जलाकर उत्सव मनाया। यह दिन भी कार्तिक मास की अमावस्या का था, और तभी से दीपक जलाकर दिवाली मनाने की परंपरा शुरू हुई। इस त्योहार का उद्देश्य भगवान राम के विजय और घर-परिवार में सुख-समृद्धि का प्रतीक है।
दिवाली पूजा का शुभ समय और मंत्र
2025 में दिवाली की पूजा का शुभ मुहूर्त 20 अक्टूबर की शाम 7 बजकर 8 मिनट से शुरू होकर 8 बजकर 18 मिनट तक रहेगा। इस समय के दौरान पूजा करने से शुभ फल प्राप्त होते हैं। दिवाली के दिन माता लक्ष्मी, भगवान गणेश और कुबेर देव के मंत्रों का जप करना अत्यंत लाभकारी माना जाता है। माता लक्ष्मी के मंत्र हैं “ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः”, भगवान गणेश के लिए “ॐ गं गणपतये नमः” और कुबेर के लिए “ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये नमः”। इन मंत्रों का जप घर में सुख-समृद्धि और खुशहाली लाता है।











