छठ पूजा का तीसरा दिन और कोसी भरने की परंपरा
छठ महापर्व के तीसरे दिन यानी संध्या अर्घ्य के समय बिहार और उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में श्रद्धालु विशेष परंपरा का पालन करते हैं, जिसमें वे कोसी भरते हैं। यह अनुष्ठान आस्था और कृतज्ञता का प्रतीक माना जाता है। इसे मुख्य रूप से तब किया जाता है जब भक्त अपनी मनोकामना पूरी होने के बाद छठी माता का धन्यवाद करने के लिए कोसी भरते हैं।
कोसी भरने का धार्मिक और सामाजिक महत्व
माना जाता है कि जब भक्त कोसी भरते हैं, तो यह उनके जीवन में सुख, समृद्धि और संतान प्राप्ति की कामना को दर्शाता है। यह परंपरा परिवार में खुशहाली, दीर्घायु और स्वस्थ जीवन की कामना के साथ जुड़ी है। साथ ही, यह मान्यता है कि कोसी भरने से किसी भी तरह की कठिनाई या रोग से मुक्ति मिलती है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण और कोसी का महत्व
छठ पूजा के दौरान कोसी में रखे गए पांच गन्ने पृथ्वी, हवा, अग्नि, जल और आकाश के तत्वों का प्रतीक हैं, जो जीवन में संतुलन और सामंजस्य बनाए रखने में मदद करते हैं। वैज्ञानिक नजरिए से देखा जाए तो सूर्य की पराबैंगनी (UV) किरणें इस समय अधिक मात्रा में पृथ्वी पर पहुंचती हैं। कोसी भरने और सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा शरीर को इन हानिकारक किरणों से बचाने का एक प्राकृतिक तरीका भी है।
कोसी भरने की विधि और परंपराएं
संध्या अर्घ्य के समय, घर की छत या आंगन में गन्नों से एक छत्र बनाया जाता है। इसके केंद्र में मिट्टी का हाथी रखा जाता है, जिसके ऊपर कलश स्थापित किया जाता है। इस कलश और हाथी में प्रसाद और पूजन सामग्री सजाई जाती है, और दीपक जलाए जाते हैं। इस अवसर पर पूरा परिवार जागरूक रहता है और लोकगीत गाए जाते हैं, जिन्हें ‘कोसी सेवना’ कहा जाता है।
कोसी का निर्माण और भरण का समय
कोसी छठ पूजा के तीसरे दिन यानी संध्या अर्घ्य के दौरान भरी जाती है। यह दिन सूर्यास्त के समय घर की छत या आंगन में विशेष विधि से मनाया जाता है। इस समय भक्त सूर्य को अर्घ्य देकर अपनी श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
संध्या अर्घ्य का महत्व
संध्या अर्घ्य वह समय है जब डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। यह व्रती की आस्था और श्रद्धा का प्रतीक है, जो सूर्यास्त के साथ ही पूरे पर्व का अंतिम चरण होता है। इस समय की पूजा भक्तों के मन में आस्था और विश्वास को मजबूत बनाती है।











